🌸 ग़ज़ल : रंगों की रूहानी होली 🌸
फागुन की हवा कह रही — रंगों में घुल जाएँ हम,
सूखी सी पड़ी रूह को फिर प्रेम से भिगो जाएँ हम।
अबीर ही क्यों गालों तक सीमित रहे हर बार,
मन के भी अँधेरों में उजियारा सा बो जाएँ हम।
जो दूरियाँ थीं दिल में, बरसों से जमी चुपचाप,
उनको भी हँसी की पिचकारी से धो जाएँ हम।
रूठे हुए अरमानों की सूनी डाली पर फिर से,
विश्वास के रंगों की चादर आज संजो जाएँ हम।
न कोई बड़ा न छोटा, सब एक से दिखें आज,
मानवता के आँगन में ऐसा रंग पिरो जाएँ हम।
क्षणभंगुर ये जीवन-मेला, ढोलक की थाप कहे,
जो कहना है प्रेम से कह दें, कल कहाँ हो जाएँ हम।
तन पर तो हर साल चढ़े हैं उत्सव के ये रंग,
इस बार मगर आत्मा तक होली रचा जाएँ हम।
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✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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