जनवरी में लगने वाला दिखावे का मेला
हर वर्ष जनवरी आती है,
सर्द हवा के साथ
एक जाना-पहचाना मेला भी—
विश्व हिंदी पुस्तक मेला।
तारीखें बदलती नहीं,
केवल पोस्टर नए होते हैं,
वही मंच, वही भाषण,
वही चमकदार बैनर,
वही औपचारिक मुस्कानें।
पुस्तकें फिर सजती हैं
शीशे की अलमारियों में,
छूने के लिए नहीं—
देखने के लिए।
पन्ने ठिठुरते हैं
भीड़ की गर्मी में भी।
यहाँ हर साल
लेखक बढ़ते जाते हैं,
किताबें बढ़ती जाती हैं,
पर पाठक—
हर जनवरी
कुछ और कम हो जाते हैं।
भीड़ है,
पर पढ़ने की नहीं,
भीड़ है
फोटो, रील, स्टेटस की।
किताब हाथ में
सिर्फ़ फ्रेम के लिए है।
जनवरी का यह मेला
अब आदत बन गया है—
एक रस्म,
एक औपचारिकता,
जहाँ हिंदी
सम्मान नहीं
प्रदर्शन का विषय है।
हर वर्ष यही दोहराव,
हर वर्ष वही प्रश्न—
क्या कभी इस मेले में
पाठक लौटेंगे?
या यह मेला
सिर्फ़ भीड़ का मेला
बनकर ही रह जाएगा?
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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