🎨 होली: रंगों की आत्मगाथा 🎨
फागुन की पहली आहट में,
जब पवन ने गुपचुप संदेश दिया,
धरती ने ओढ़ी गुलाल की चूनर,
अंबर ने भी हँसकर साथ लिया।
टेसू की डालों से टपका सूरज,
सरसों ने सोने सा गान किया,
मन के भीतरे कोने-कोने में,
रंगों ने अपना स्थान लिया।
ना केवल गालों पर अबीर सजे,
ना केवल बाहों में पिचकारी हो,
आज हृदय की सूखी धरती पर,
प्रेम की सतरंगी फुलवारी हो।
राधा की पायल सी झंकार उठे,
श्याम का स्वर जैसे बाँसुरी,
हर द्वेष धुले इस फागुन में,
हर दूरी हो जाए आधी दूरी।
भीतर जो धूल जमी बरसों से,
उसको भी आज भिगोना है,
केवल देह नहीं, अंतर्मन को
रंगों में फिर से पिरोना है।
किसी आँख में जो पीड़ा है,
उसमें विश्वास का रंग भरें,
जो हाथ छूटकर दूर हुए,
उन्हें आज हँसकर संग करें।
न कोई बड़ा, न कोई छोटा,
सब एक ही राग में डूबे हों,
मानवता के उजले कैनवास पर
स्नेहिल हस्ताक्षर ऊँचे हों।
ढोलक की थापें कहती हैं —
“जीवन क्षणभंगुर, हँस लो रे!”
जो कहना है प्रेम से कह दो,
कल का किसने क्या देखा रे?
तो आओ, ऐसी होली खेलें
जो केवल रंग न बरसाए,
मनुष्यत्व की प्यासे जग में
करुणा का सागर ले आए।
फागुन का यह पावन अवसर
संदेश नया दे जाए —
रंग अगर तन पर चढ़ते हैं,
तो आत्मा भी मुस्काए।
🌸 रंगों से अधिक, रिश्तों की होली हो।
अबीर से अधिक, आत्मा की रोली हो। 🌸
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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