Friday, 13 March 2026

फेसबुक के कवि (हास्य–व्यंगात्मक कविता)

फेसबुक के कवि

(हास्य-व्यंग्यात्मक कविता)

फेसबुक की फुलवारी में, कवियों की भरमार,

जिस डाली पर दृष्टि डालिए, लटका एक विचार।

कोई दर्द की गठरी लेकर, कोई प्रेम-पिटारा,

दो पंक्तियों में बाँट रहा है जीवन-सागर सारा।

कल तक जो “हाय-हेलो” में भी, अटक-अटक रह जाते थे, 

आज वही भावों के घोड़े पर, छंदों सहित इठलाते हैं।


सुबह-सुबह ही पोस्ट चिपकती—

“रात बहुत संगीन थी”,

नीचे देखा, फोटो नयी थी,

ऊपर लिखी “ज़मीन थी”!

कोई लिखता—

“चाँद मेरी चौखट पर रोया,

सूरज मेरे द्वारे सोया”,

पाठक बेचारा सोच रहा है—

“आख़िर ये सब किसने ढोया?”


उपमाओं के उधार-गृह से, शब्द उठा लाते हैं,

रूपक की रंगरेज़ी करके, खुद को तुलसी बताते हैं।

अनुप्रास की ऐसी आंधी, अक्षर-अक्षर काँप उठे,

अर्थ बेचारा कोने बैठा, सिर पर रखकर हाथ लिये।


नयनों को वे नीर बताते, अधरों को अंगार,

जुल्फों में बरसात बाँधते, गालों में गुलज़ार।

सेल्फी के संग शेर लगाकर, बनते भाव-विभोर,

मानो काव्य-गंगा बहती, मोबाइल के इक छोर!


“मैं टूटा हूँ, बिखरा हूँ,

जग से थोड़ा खिसका हूँ”,

ऐसी पोस्टें पढ़-पढ़कर अब

लगता—कम खिसका हूँ!


लाइक यहाँ पर लक्ष्मी मैया, कमेंट बड़े वरदान,

“वाह-वाह” के पुष्प चढ़ाकर, करते सब सम्मान।

जिसको बीस प्रशंसा मिल जाए, वह भवभूति कहलाए,

जिसके सौ दिल एकत्र हो जाएँ, वह कालिदास बन जाए!


कुछ कवियों की रचना में तो, ऐसा घना कुहासा,

चार पंक्ति में सात पहेली, आठ उपमाएँ पासा।

पूछो— “भाई, आशय क्या है?”

कहते— “यह अनुभूति है”,

समझ न आए तो दोष तुम्हारा,

उनकी कहाँ त्रुटि है!


मित्र-मंडली भी अद्भुत देखो, कैसी नीति निभाती है,

चाहे कविता उलटी-पुलटी, “लाजवाब” बतलाती है।

एक ने लिखा— “पत्थर हँसते, पत्ते करते शोर”,

दूजे ने कमेंट किया— “वाह! हिला दिया मन-डोर!”


पर इस हँसी के बीच कहीं यह सच्चाई भी रहती है,

भीड़ बहुत है शब्दों की पर, चुप्पी गहरी बहती है।

कुछ चेहरे सचमुच लिखते हैं अपने मन की पीड़ा,

कुछ रचनाएँ जन्म लेती हैं सहकर जीवन-क्रीड़ा।


कवि वही जो शब्द नहीं, संवेदना भी गढ़ता हो,

जो भाषा के आँगन में सच का दीपक धरता हो।

पोस्ट बनाना सरल बहुत है, कविता होना साधन,

जिसमें जीवन तपकर निकले, वही काव्य का आँगन।


इसलिए हे फेसबुक-कवि, व्यंग्य हमारा मान,

थोड़ा हँस लो, थोड़ा सोचो, थोड़ा रखो ध्यान।

शब्द अगर बस शोर बनेंगे, खो जाएगा सार,

कविता तब ही जीवित होगी, जब हो सच्चा प्यार।


फेसबुक की इस दुनिया में, लिखना कोई पाप नहीं,

पर कविता की देहरी पर बस, दिखावा स्वीकार नहीं।

मन के कुंभ में भाव पके हों, भाषा हो सुघड़, गंभीर,

तब ही कविता फूल बनेगी, वरना केवल तदबीर।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन


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