Monday, 2 March 2026

🔥 होलिका दहन : आत्मविजय और सजगता का उत्सव 🔥

 

🔥 होलिका दहन : आत्मविजय और सजगता का उत्सव 🔥

जब-जब बढ़ा अधर्म धरा पर,

जब-जब अहंकार ने डाली छाया,

तब-तब जली होलिका की ज्वाला,

और सत्य ने विजय-संगीत गाया।


यह केवल लकड़ियों का दहन नहीं,

यह मन के अंधकार का अंत है,

यह भय पर विश्वास की जीत,

और अन्याय पर धर्म का विजय-ध्वज है।


याद करो उस बालक की दृढ़ता—

अटल श्रद्धा, अडिग विश्वास,

जिसने अग्नि की लपटों में भी

न छोड़ा ईश्वर का साथ।


होलिका जली, पर बच गया विश्वास,

भस्म हुआ छल और अभिमान,

प्रेम की ज्योति अमर हो उठी,

जीत गया सच्चा इंसान।


पर सुनो, यह कथा आज भी कहती है—

हर युग में होती है होलिका नई,

कभी वह रूप बदलकर आती है,

कभी मुस्कान में छिपी होती है वही।


विषैले व्यक्ति वे हैं जीवन में,

जो ऊर्जा को धीरे-धीरे चूसें,

जो बातों में मधुर लगें पर भीतर

ईर्ष्या के बीज निरंतर बोएँ और दुख सींचे।


पहचानो उन्हें—

जो हर सफलता पर ताना कसें,

जो हर निर्णय पर संदेह रचें,

जो आपकी सीमाओं को तोड़

अपने स्वार्थ की आग रचें।


जो बार-बार अपराधबोध जगाएँ,

जो आपको ही दोषी ठहराएँ,

जो आपकी खुशियों पर प्रश्नचिन्ह लगा 

अपने अहंकार का ताज सजाएँ।


छोटी होली का यह पावन क्षण

सिखाता है सजग रहना भी,

केवल प्रेम ही नहीं, 

आवश्यक है सीमा रखना भी।


बचने के उपाय भी सीखो—

अपनी सीमाएँ स्पष्ट बताओ,

अनुचित व्यवहार पर मौन नहीं,

दृढ़ स्वर में ‘न’ कहना अपनाओ।


अत्यधिक सफाई मत दो हर बात की,

अपनी शांति को प्रथम स्थान दो,

जहाँ सम्मान न मिले तुम्हें,

वहाँ से स्वयं को विराम दो।


सकारात्मक संगति चुनो,

आत्मसम्मान को आधार बनाओ,

अपने भीतर के प्रह्लाद को जगाकर

साहस का दीप जलाओ।


आज होलिका दहन में केवल

लकड़ियाँ ही न जलाएँ हम,

जलाएँ विषैले संबंधों का भय,

और निर्भय होकर आगे बढ़ें हम।


राख से उठेगा नव विश्वास,

स्वाभिमान का सुंदर प्रकाश,

जब सजगता संग चलेगा प्रेम,

तभी खिलेगा जीवन का आकाश।


🔥 होलिका दहन का संदेश यही—

अंधकार जलाओ, आत्मबल बढ़ाओ,

विषाक्तता से दूर रहकर

सत्य और सम्मान का जीवन अपनाओ। 🔥


 लेखाधिकारी सुरक्षित : डॉ नीरू मोहन

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