26 जनवरी : नवचेतना का उद्घोष
यह केवल एक तारीख नहीं,
यह संकल्प की वह भोर है
जब शब्द बने संविधान,
और विचारों को मिला राष्ट्र।
लाल क़िले से नहीं,
जन-जन के मन से उठी थी
लोकतंत्र की पहली आवाज़—
“हम भारत के लोग…”
स्याही में नहीं,
रक्त-त्याग में लिखा गया
न्याय, समता और स्वतंत्रता का अध्याय।
आज के युवाओ!
यह ध्वज केवल लहराने को नहीं,
दायित्व का संकेत है—
नीला अशोकचक्र पूछता है तुमसे
क्या गति है तुम्हारे कर्मों में?
केसरिया याद दिलाता है
बलिदान सिर्फ़ इतिहास नहीं,
वर्तमान की परीक्षा भी है।
समाज के कंधों पर टिकी है
संविधान की मर्यादा—
जहाँ अधिकार तभी अर्थ रखते हैं
जब कर्तव्य जाग्रत हों।
नारे नहीं, निर्माण चाहिए,
भीड़ नहीं, विवेक चाहिए,
वायरल पोस्ट नहीं,
सार्थक प्रयोजन चाहिए।
आओ!
26 जनवरी को
केवल परेड में नहीं,
अपने आचरण में उतारें—
भाषा में संयम,
विचार में वैज्ञानिकता,
और कर्म में राष्ट्रबोध।
जब युवा सजग होगा,
तब लोकतंत्र सशक्त होगा;
जब समाज संवेदनशील होगा,
तब संविधान जीवित होगा।
यही गणतंत्र का नवीनीकरण है—
हर पीढ़ी द्वारा
फिर-फिर किया गया वचन।
🇮🇳 जय संविधान। जय भारत। 🇮🇳
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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