क्या भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली अपने अंत की ओर बढ़ रही है?
यह कथन कि आने वाले दस वर्षों में भारत के 80% कॉलेज और विश्वविद्यालय अप्रासंगिक या बंद हो सकते हैं, पहली नज़र में अतिशयोक्ति प्रतीत होता है। किंतु यदि हम भावनाओं से नहीं, आंकड़ों, श्रम-बाज़ार के रुझानों और तकनीकी यथार्थ से बात करें, तो यह आशंका चौंकाने वाली नहीं रह जाती—बल्कि तर्कसंगत लगने लगती है।
आज का भारत एक विचित्र विरोधाभास से गुजर रहा है। एक ओर लाखों युवा डिग्रियाँ लेकर बेरोज़गार या अल्प-वेतन पर कार्यरत हैं, दूसरी ओर कुशल श्रमिकों की भारी माँग है।
प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, टाइल वर्कर जैसे पेशे—जिन्हें अब तक “कम प्रतिष्ठित” माना जाता था—आज स्थिर, मांग-आधारित और बढ़ती आय प्रदान कर रहे हैं। वहीं डिलीवरी पार्टनर, छोटे दुकानदार और तकनीकी सेवा प्रदाता बिना किसी औपचारिक दीक्षांत समारोह के तुरंत नकद प्रवाह अर्जित कर रहे हैं।
इसके विपरीत, सामान्य कॉलेजों से निकले बीए, बीकॉम, बीएससी या यहाँ तक कि टियर–2/3 एमबीए स्नातक—अक्सर न्यूनतम वेतन, अस्थायी अनुबंध और “अनुभव की शर्त” के जाल में फँसे रहते हैं। उनकी आय तब तक स्थिर रहती है, जब तक वे अतिरिक्त कौशल स्वयं न जोड़ें—जो व्यवस्था का वादा नहीं, व्यक्ति का संघर्ष होता है।
यह अंतर संयोग नहीं है; यह संरचनात्मक विफलता का संकेत है।
कौशल बनाम डिग्री: बदलती प्राथमिकताएँ
इक्कीसवीं सदी की अर्थव्यवस्था डिग्री-केंद्रित नहीं, कौशल-केंद्रित होती जा रही है। कौशल:
तेज़ी से सीखे जा सकते हैं
मांग के साथ विकसित होते हैं
सीधे आय से जुड़े होते हैं
और समय-समय पर अपडेट किए जा सकते हैं
जबकि अधिकांश डिग्रियाँ:
स्थिर पाठ्यक्रम पर आधारित हैं
बाज़ार से कटे हुए हैं
वर्षों तक वही ज्ञान दोहराती हैं
और मूल्यह्रास (depreciation) का शिकार हैं
जब कौशल हर दो–तीन वर्ष में अप्रचलित हो जाते हैं, तब तीन या पाँच वर्ष की स्थिर डिग्री किस भविष्य की सुरक्षा देती है?
उत्तर असहज है—लगभग किसी की नहीं।
शिक्षा प्रणाली का मूल संकट
समस्या केवल कॉलेजों की नहीं है; समस्या शासन और दृष्टि की है। भारत की शिक्षा नीति का संचालन आज भी ऐसे प्रशासनिक ढाँचों के हाथ में है, जो:
जोखिम से बचने में विश्वास रखते हैं
नवाचार को प्रक्रिया में उलझा देते हैं
और परिवर्तन को “फाइल मूवमेंट” समझते हैं
नीतियाँ बनाने वाले अधिकांश निर्णयकर्ता उसी परीक्षा प्रणाली से निकले हैं, जो स्मृति, अनुशासन और आज्ञाकारिता को पुरस्कृत करती है—रचनात्मकता, सिस्टम थिंकिंग या अनिश्चितता से जूझने की क्षमता को नहीं।
यही कारण है कि नई शिक्षा नीति जैसे प्रयास भी जन्म लेते ही पुराने लगने लगते हैं, क्योंकि दुनिया उनसे कहीं तेज़ गति से आगे बढ़ चुकी होती है।
भविष्य का श्रमिक कौन होगा?
आज स्कूल में प्रवेश लेने वाला बच्चा जब 2040–45 के आसपास स्नातक बनेगा, तब दुनिया में:
व्यापक ऑटोमेशन होगा
करियर एक नहीं, अनेक होंगे
डोमेन लगातार बदलेंगे
और सीखना एक सतत प्रक्रिया होगी
उस समय समाज को चाहिए होंगे:
सिस्टम में सोचने वाले मनुष्य
डेटा के साथ तर्क करने वाले मस्तिष्क
भावनात्मक और संज्ञानात्मक लचीलापन
अस्पष्ट समस्याओं का समाधान करने की क्षमता
परंतु हमारी कक्षाएँ आज भी:
एक–सा पाठ्यक्रम पढ़ा रही हैं
प्रयोग को औपचारिकता बना चुकी हैं
और सभी छात्रों को एक ही साँचे में ढालना चाहती हैं
यह शिक्षा नहीं, संस्थागत जड़ता है।
निष्कर्ष: डिग्री नहीं, दिशा चाहिए
यह कहना कि “डिग्री बेकार है” एक सरलीकरण होगा। समस्या डिग्री की अवधारणा नहीं, डिग्री की वर्तमान संरचना और उद्देश्य है। जब तक उच्च शिक्षा:
बाज़ार से संवाद नहीं करेगी
कौशल को केंद्र में नहीं रखेगी
और सीखने को आजीवन प्रक्रिया नहीं मानेगी
तब तक कॉलेजों की संख्या बढ़ती रहेगी,
पर प्रासंगिकता घटती जाएगी।
और तब 80% संस्थानों के बंद होने की बात
अतिशयोक्ति नहीं,
बल्कि पूर्वानुमान मानी जाएगी।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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