नारी : नवचेतना-नवप्रभा
नारी—
ममता-मंदाकिनी-मधुरिमा,
करुणा-किरण-कुसुमिता;
सृजन-सरिता-सुगंधिता,
संघर्ष-संकल्प-स्फुरिता।
वह—
धैर्य-धरित्री-सी धीर,
आत्मविश्वास-अग्नि-दीप्त;
आकाश-आकांक्षा-असीम,
स्वप्न-सुमन-संचित।
उसकी दृष्टि में
प्रज्ञा-प्रभात-प्रकाश,
उसके हृदय में
संवेदना-सरस-संसार।
वह—
त्याग-तपोवन-तरुवर,
साहस-सूर्य-समुज्ज्वल;
विपदा-वज्र-वर्षा में भी
आशा-अंकुर-अविकल।
कभी
ममता-मधु-मंजरी बन
दुख-दग्ध-मन सींचे,
कभी
चेतना-चण्डिका बन
अन्याय-अंधकार भींचे।
वह—
संस्कृति-सरोवर-सुगंध,
समता-सम्मान-साधना;
मानवता-मंगल-मालिनी,
भविष्य-भोर-भावना।
आओ—
नारी-नमन-नवगीत गाएँ,
सम्मान-सुमन-सजाएँ;
क्योंकि वही है—
जीवन-ज्योति-जननी,
सृष्टि-सृजन-साधना।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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