Sunday, 8 March 2026

नारी : नवचेतना-नवप्रभा

 नारी : नवचेतना-नवप्रभा

नारी—

ममता-मंदाकिनी-मधुरिमा,

करुणा-किरण-कुसुमिता;

सृजन-सरिता-सुगंधिता,

संघर्ष-संकल्प-स्फुरिता।

वह—

धैर्य-धरित्री-सी धीर,

आत्मविश्वास-अग्नि-दीप्त;

आकाश-आकांक्षा-असीम,

स्वप्न-सुमन-संचित।

उसकी दृष्टि में

प्रज्ञा-प्रभात-प्रकाश,

उसके हृदय में

संवेदना-सरस-संसार।

वह—

त्याग-तपोवन-तरुवर,

साहस-सूर्य-समुज्ज्वल;

विपदा-वज्र-वर्षा में भी

आशा-अंकुर-अविकल।

कभी

ममता-मधु-मंजरी बन

दुख-दग्ध-मन सींचे,

कभी

चेतना-चण्डिका बन

अन्याय-अंधकार भींचे।

वह—

संस्कृति-सरोवर-सुगंध,

समता-सम्मान-साधना;

मानवता-मंगल-मालिनी,

भविष्य-भोर-भावना।

आओ—

नारी-नमन-नवगीत गाएँ,

सम्मान-सुमन-सजाएँ;

क्योंकि वही है—

जीवन-ज्योति-जननी,

सृष्टि-सृजन-साधना।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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