Tuesday, 3 March 2026

धुलेंडी : रंगों का आत्मसंवाद

धुलेंडी : रंगों का आत्मसंवाद

राख से उठती रागिनी,

धधकती धूल में धुला अभिमान,

होलिका दहन की ज्वाला से

आज जन्मा नव-इंसान।

रंगों ने रच दी रचना नई,

हर कण में करुणा की काया,

सूनी साँसों की सरगम ने

जीवन का जश्न मनाया।

गुलाल नहीं — ये गालों पर

गर्वित गाथा का स्पर्श है,

भीतर जमी हुई बर्फ़ों पर

बसंत का मधुर उत्कर्ष है।

लाल रंग ललकार बना है,

अन्यायों से जंग का,

पीला रंग प्रतीक बना है

आस्था के उमंग का।

नीला नभ-सा निडर बने मन,

हरा धरा-सा धैर्य धरे,

भीतर के भय-भस्मासुर को

हँसकर हर मानव परे।

धुलेंडी की यह धूल नहीं,

संघर्षों का श्रृंगार है,

जो गिरकर भी उठ खड़ा हो —

वही सच्चा त्यौहार है।

रंग नहीं ये केवल बाहर,

ये अंतर की आभा हैं,

जो विष-बेलें मन में उगतीं —

उन पर प्रहार की प्रभा हैं।

आओ आज धुलेंडी पर हम

द्वेष-दहन का व्रत लें,

मन की मलिनता माटी में मिलाकर

मानवता का रंग गढ़ें।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

No comments:

Post a Comment