Sunday, 29 March 2026

“रिश्तों का अपहरण” कविता

 “रिश्तों का अपहरण”

वो बहन नहीं—मधु का मुखौटा थी,

जिसने ममता का मान गिराया,

राखी के धागों की मर्यादा

स्वार्थ की अग्नि में जलाया।

वो बहनोई नहीं—मोह का व्यापारी,

जिसने घर-घर सौदे किए,

जिस थाली में थूका करता था,

आज उसी के कण-कण जीए।

वो भांजा नहीं—कपट का अंकुर,

जिसने संस्कारों को त्याग दिया,

मामा के आँगन की छाया को

लालच की धूप में बाँट दिया।

वो भांजी नहीं—विष-हँसी की छाया,

जिसकी मुस्कान में छल बसा,

निर्दोष बचपन की आड़ में

हर रिश्ते का सच ही धँसा।

भाई के हक पर जो डाका डाले,

वो कैसा अपना कहलाता है?

जिसने रक्त के रिश्तों को तोड़ा,

वो सुख से कब मुस्काता है?

थूका था जिसने उस चौखट पर,

आज उसी का अन्न निगलता है,

कर्मों का दर्पण झूठ नहीं बोलता—

हर चेहरा सच उगलता है।

बच्चों की हाय जब लगती है,

तो भाग्य भी रूठ ही जाता है,

अधिकार छीनने वाला अंत में

खुद से ही छूट ही जाता है।

सोने के महल भी ढह जाते हैं,

जब नींव में आँसू होते हैं,

धोखे की दीवारें गिरती हैं—

जब सत्य के पत्थर होते हैं।

सीख यही है हर इंसान के लिए—

रिश्ते धन से ऊपर होते हैं,

जो अपनों को ही लूट गया,

वो जीवन भर रोते हैं।

अधिकार नहीं—आशीष कमाओ,

सत्य के पथ पर चलना सीखो,

वरना समय की कठोर अदालत में

हर छल का दंड ही देखो।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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