Saturday, 14 March 2026

कौन है सच का वारिस

 शीर्षक: “कौन है सच का वारिस?”


जिसने आँगन में धूप सहेजी,

जिसने छाँव को घर बनाया,

जिसने माँ की थकी हथेली को

हर दिन अपने माथे लगाया।


जिसने पिता की झुकी कमर को

अपने कंधों का बल दिया,

जिसने सास–ससुर को भी

माँ–बाप सा ही मान लिया।


वही बेटा… वही बहू

आज कटघरे में खड़े किए जाते हैं,

और जो दूर से रिश्ते निभाते थे

वे वारिस बनकर घर ले जाते हैं।


बेटी–दामाद मुस्काते हैं

काग़ज़ों के खेल दिखाकर,

मौके की नब्ज़ पहचानकर

हक़ का दीपक ही बुझाकर।

सब कहते हैं—

“देखो, कितने भाग्यशाली हैं माँ–बाप,

बेटी ने कितना साथ दिया!”

पर कोई नहीं पढ़ पाता

उन आँखों का मौन जिया।


जो बेटा हर आँधी में

दीवार बनकर खड़ा रहा,

जो बहू हर अपमान सहकर भी

घर का दीप जलाती रही।


वही आज लालच के बाज़ार में

सबसे सस्ता करार दिया जाता है,

और जो जीवन भर दूर रहे

उन्हें सबसे बड़ा उपकार बताया जाता है।


संपत्ति के काग़ज़ों पर

रिश्तों की कीमत लिख दी जाती है,

सच की आवाज़ दबाकर

झूठ की जय-जयकार की जाती है।


समाज की चौपाल पर

फैसले भी कितने अजीब होते हैं—

जो त्याग करे वह अपराधी,

जो हड़पे वही नसीब होते हैं।


पर इतिहास गवाह रहेगा—

काग़ज़ घर के मालिक बना सकते हैं,

पर सेवा और त्याग ही

दिलों के असली वारिस कहलाते हैं।


एक दिन सच की धूप निकलेगी,

और झूठ की छाया सिमट जाएगी,

जिस बेटे ने जीवन भर दिया

वही विरासत की असली कहानी कहलाएगी।


जब दुख के बादल घिर–घिरकर आते हैं।

तब मन के उद्गार शब्दों में बँध जाते हैं।

बीती बातें, बीते लम्हें नासूर बने छिपे कहीं

सोच की दीवार से बाहर खिड़की से झांकते हैं।


कहते हैं छला गया है जो सच्चा इंसान 

सब्र उसका खाली नहीं जाएगा।

जिसने लूटा है घर उसका जानबूझकर

एक दिन वो बिन पानी ही मर जाएगा।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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