कहानी : “रीस्टार्ट बटन”
अर्जुन मोबाइल स्क्रीन पर उँगली फेरते-फेरते थक चुका था।
नोटिफिकेशन की भीड़, दूसरों की चमकती ज़िंदगी, और अपने भीतर फैलता खालीपन—सब कुछ एक साथ सिर पर सवार था। इंजीनियरिंग की डिग्री हाथ में थी, लेकिन नौकरी नहीं। हर दिन माँ का वही सवाल—“आज कुछ हुआ?”—और हर बार वही जवाब—“देख रहा हूँ।”
एक रात अर्जुन ने इंस्टाग्राम बंद किया और फोन को उल्टा रख दिया। अचानक उसे लगा जैसे कमरे में पहली बार सन्नाटा उतरा हो। उसी सन्नाटे में उसे अपनी पुरानी डायरी याद आई—वह जिसमें उसने कॉलेज के पहले साल में लिखा था, “मुझे कुछ अपना बनाना है, भीड़ का हिस्सा नहीं।”
अगले दिन उसने एक छोटा-सा फैसला लिया।
न बड़ी घोषणा, न सोशल मीडिया पोस्ट—बस रोज़ तीन घंटे अपने कौशल पर काम। उसने डेटा एनालिटिक्स सीखा, मुफ्त कोर्स किए, रोज़ एक प्रोजेक्ट बनाया। दोस्त बोले—“इससे क्या होगा?”—पर अर्जुन ने जवाब देना छोड़ दिया और काम करना शुरू कर दिया।
तीन महीने बाद भी नौकरी नहीं मिली। हौसला डगमगाया। उसी रात माँ ने चुपचाप उसके कमरे में चाय रख दी और बस इतना कहा—
“बीज बोया है तो समय दो, फल अपने आप आएगा।”
छठे महीने अर्जुन ने एक ओपन-सोर्स प्रोजेक्ट में योगदान दिया। किसी बड़े नाम से नहीं, बल्कि अपने काम से पहचान बनी। सातवें महीने एक स्टार्टअप से मेल आया—“आपका काम देखा, बात करेंगे?”
इंटरव्यू छोटा था, सवाल सीधे। अर्जुन ने आत्मविश्वास से नहीं, ईमानदारी से जवाब दिए। दो दिन बाद ऑफर लेटर आया। सैलरी बहुत बड़ी नहीं थी, पर रास्ता साफ़ था।
उस शाम अर्जुन ने फिर फोन उठाया। इस बार पोस्ट करने के लिए नहीं—डायरी खोलने के लिए। उसने लिखा:
“ज़िंदगी में सबसे ज़रूरी अपडेट बाहर नहीं, अंदर होता है। जब हम खुद पर काम करते हैं, तब किस्मत भी नोटिस करती है।”
और हाँ—उसने एक बात और समझ ली थी—
हर युवा के पास एक ‘रीस्टार्ट बटन’ होता है। उसे दबाने की हिम्मत चाहिए।
प्रेरणा संदेश (आज के युवाओं के लिए)
👉 तुलना छोड़िए, कौशल चुनिए।
👉 दिखावा नहीं, निरंतरता अपनाइए।
👉 देर से सही, पर सही दिशा में चलिए।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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