Monday, 19 January 2026

विश्व पुस्तक मेला #डॉ नीरू मोहन

पुस्तकों का मेला लगता हर वर्ष है।

पोस्टरों में चमक, चेहरों पर हर्ष है।

पर! हर हाथ में किताब नहीं,

हर हाथ में कैमरा है—

पन्नों से ज़्यादा

पोस्ट की चिंता है।


मंच सजे हैं, भाषण गूंजे,

तालियाँ बजतीं—

पर सुनने वाला मन

कहीं खो गया है।

लेखक हैं, किताबें हैं,

पर पाठक

कुर्सियों के बीच

दुर्लभ प्रजाति-सा बैठा है।


भीड़ है—

हाँ, बहुत भीड़ है,

पर यह भीड़ पढ़ने नहीं आई,

यह आई है

दिखने, दिखाने,

सेल्फ़ी लेने,

स्टेटस लगाने के लिए।


किताबें बाँटी जाती हैं

जैसे विज़िटिंग कार्ड,

पढ़ी जाएँगी या नहीं—

यह प्रश्न

अब अप्रासंगिक है।

महत्वपूर्ण यह है कि

किसके साथ फोटो खिंची।


हिंदी यहाँ

सम्मानित नहीं,

प्रदर्शित है—

एक औपचारिक रस्म की तरह,

जहाँ शब्द

सजावट बन गए हैं

और विचार

कोने में खड़े हैं।


यह मेला

पुस्तकों का नहीं,

पब्लिसिटी का उत्सव है—

जहाँ पढ़ना

सबसे शांत,

सबसे अकेली क्रिया बन चुका है।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन 

No comments:

Post a Comment