Friday, 29 May 2026

कहानी “सुकून की तलाश”

 कहानी

“सुकून की तलाश”

रीमा महानगर की भागती जिंदगी से थक चुकी थी। ऊँची इमारतों और मशीनों जैसी दिनचर्या ने उसके चेहरे की मुस्कान छीन ली थी। एक दिन उसने तय किया कि वह कुछ समय अपने लिए जिएगी।

इंटरनेट पर खोजते-खोजते उसकी नजर शिलांग की तस्वीरों पर पड़ी। बादलों से ढकी पहाड़ियाँ, ऊँचे झरने और हरियाली देखकर उसका मन वहीं खो गया। उसने तुरंत शिलांग जाने का निर्णय ले लिया।

जब वह शिलांग पहुँची, तब हल्की बारिश हो रही थी। पहाड़ों के बीच से गुजरती सड़कें और ठंडी हवा उसके मन को छू रही थीं। उसे लगा जैसे वर्षों बाद उसने खुलकर साँस ली हो।

अगले दिन वह एक झरने के पास बैठी थी। पानी की आवाज सुनते-सुनते उसकी आँखें बंद हो गईं। तभी एक बुजुर्ग महिला वहाँ आई और मुस्कुराकर बोली—

“बेटी, प्रकृति के पास हर दर्द की दवा होती है।”

रीमा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा। महिला ने कहा—

“लोग शहरों में सुख ढूँढ़ते हैं, जबकि सुकून प्रकृति की गोद में मिलता है।”

उनकी बातें रीमा के मन में उतर गईं। उसने महसूस किया कि जिंदगी केवल दौड़ने का नाम नहीं है। कभी-कभी ठहरना भी जरूरी होता है।

शिलांग के कुछ दिन उसके जीवन की दिशा बदल गए। लौटते समय उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी, जो वर्षों पहले कहीं खो गई थी।

अब जब भी जिंदगी उसे थकाने लगती, वह आँखें बंद कर शिलांग के झरनों की आवाज याद कर लेती—और उसके भीतर फिर से जीने की उम्मीद जाग उठती।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

No comments:

Post a Comment