भाषा शिक्षण में AI का प्रयोग : संभावनाएँ एवं चुनौतियाँ
शब्दों में जब चेतना का दीप जलाया जाए,
तो सभ्यता का पथ स्वयं उज्ज्वल हो जाए।
तकनीक छुए जब भाषा की कोमल तान,
नवयुग का शिक्षण तब इतिहास रच जाए।
भाषा मानव सभ्यता की आत्मा है। विचारों की अभिव्यक्ति, संस्कृति का संरक्षण, ज्ञान का संचरण और सामाजिक संबंधों का निर्माण—इन सभी का आधार भाषा ही है। समय के साथ भाषा शिक्षण की पद्धतियाँ भी परिवर्तित होती रही हैं। गुरुकुल प्रणाली से लेकर कक्षा-कक्ष आधारित शिक्षण, फिर ऑडियो-विजुअल माध्यम और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) तक—भाषा शिक्षण निरंतर विकासशील रहा है।
इक्कीसवीं सदी में AI ने शिक्षा जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन आरंभ कर दिया है। विशेषतः भाषा शिक्षण के क्षेत्र में AI ने व्यक्तिगत अधिगम, त्वरित मूल्यांकन, बहुभाषिकता और वैश्विक संवाद की नई संभावनाएँ खोली हैं। किंतु जहाँ संभावनाएँ हैं, वहीं कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी हैं। यह ऐसी तकनीक है जिसके अंतर्गत मशीनों को मानव जैसी सोच, समझ, निर्णय क्षमता और सीखने की योग्यता प्रदान की जाती है। AI में प्रमुख रूप से— मशीन लर्निंग (Machine Learning), नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP),
डीप लर्निंग (Deep Learning), स्पीच रिकग्निशन,
टेक्स्ट एनालिसिस जैसी तकनीकों का उपयोग होता है। भाषा शिक्षण में AI का आधार मुख्यतः NLP है, जो भाषा को समझने, विश्लेषण करने और उत्पन्न करने में सक्षम बनाती है।
हम सभी जानते हैं कि भाषा मानव समाज की मूलभूत आवश्यकता है। यह केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि विचार, भावना, संस्कृति और ज्ञान परंपरा की संवाहिका है। भाषा के माध्यम से ही व्यक्ति अपनी पहचान गढ़ता है और समाज से जुड़ता है। इसलिए भाषा शिक्षण का उद्देश्य मात्र पढ़ना–लिखना सिखाना नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति, संवाद और संवेदनशीलता का विकास करना है। समय के साथ शिक्षा की पद्धतियाँ बदली हैं और आज हम एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) भाषा शिक्षण की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित कर रही है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऐसी तकनीक है जो मशीनों को मानव जैसी सोचने, सीखने, निर्णय लेने और भाषा को समझने की क्षमता प्रदान करती है। इसके अंतर्गत मशीन लर्निंग, नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग, स्पीच रिकग्निशन और डीप लर्निंग जैसी प्रणालियाँ कार्य करती हैं। विशेष रूप से नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग भाषा शिक्षण का आधार बनकर उभरी है, जिसके माध्यम से मशीनें भाषा को समझने, विश्लेषण करने और उत्पन्न करने में सक्षम हो पाती हैं।
परंपरागत भाषा शिक्षण व्यवस्था प्रायः शिक्षक-केंद्रित रही है, जहाँ सभी विद्यार्थियों के लिए एक ही पाठ्यवस्तु, एक ही गति और एक ही पद्धति अपनाई जाती रही। इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ विद्यार्थी आगे निकल जाते हैं, तो कुछ पीछे छूट जाते हैं। AI आधारित भाषा शिक्षण इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है। यह प्रत्येक शिक्षार्थी की क्षमता, रुचि और अधिगम-गति का विश्लेषण कर उसके अनुसार सामग्री प्रस्तुत करता है। इसे वैयक्तिकृत अधिगम कहा जाता है। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई छात्र हिंदी व्याकरण में काल या संधि में कमजोर है, तो AI उसे उसी विषय पर बार-बार अभ्यास और उदाहरण उपलब्ध कराता है, जबकि अन्य विषयों में अनावश्यक बोझ नहीं डालता।
भाषा शिक्षण में उच्चारण और श्रवण कौशल का विशेष महत्व है। पारंपरिक कक्षा में शिक्षक सभी छात्रों के उच्चारण पर समान रूप से ध्यान नहीं दे पाता। AI आधारित स्पीच रिकग्निशन तकनीक इस कमी को दूर करती है। यह छात्र के उच्चारण की तुलना मानक उच्चारण से कर त्रुटियों की पहचान करती है और सुधारात्मक सुझाव देती है। छात्र बिना संकोच के बार-बार अभ्यास कर सकता है। इस प्रकार भाषा-भय समाप्त होता है और आत्मविश्वास का विकास होता है।
लेखन कौशल के विकास में भी AI की भूमिका उल्लेखनीय है। AI आधारित टूल्स छात्र के लेखन में व्याकरणिक अशुद्धियों, वर्तनी-दोषों, वाक्य संरचना की त्रुटियों और शैलीगत कमजोरियों की ओर संकेत करते हैं। इससे छात्र यह समझ पाता है कि उसके विचार कहाँ अस्पष्ट हैं और उन्हें अधिक प्रभावी कैसे बनाया जा सकता है। यह प्रक्रिया लेखन को केवल परीक्षा-केंद्रित न रखकर रचनात्मक और अभिव्यक्तिपूर्ण बनाती है।
AI बहुभाषिकता को भी बढ़ावा देता है। भारत जैसे बहुभाषी देश में यह विशेष रूप से उपयोगी है। AI अनुवाद और भाषा तुलना के माध्यम से छात्र को अपनी मातृभाषा से अन्य भाषाएँ सीखने में सहायता करता है। इससे नई भाषा सीखने का भय कम होता है और भाषाई आत्मविश्वास बढ़ता है। छात्र यह समझ पाता है कि भाषाएँ एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
भाषा शिक्षण में AI शिक्षक की भूमिका को समाप्त नहीं करता, बल्कि उसे और अधिक प्रभावी बनाता है। AI पाठ योजना निर्माण, अभ्यास सामग्री तैयार करने और मूल्यांकन में शिक्षक का सहायक बनता है। इससे शिक्षक का समय प्रशासनिक कार्यों से बचता है और वह संवाद, रचनात्मक गतिविधियों तथा नैतिक–सांस्कृतिक शिक्षण पर अधिक ध्यान दे सकता है।
AI आधारित मूल्यांकन प्रणाली भाषा शिक्षण में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन लेकर आई है। यह त्वरित, निष्पक्ष और विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रदान करती है। छात्र को तुरंत यह पता चल जाता है कि उसने कहाँ गलती की और उसमें सुधार कैसे किया जा सकता है। दीर्घकालिक प्रगति रिपोर्ट से शिक्षार्थी और शिक्षक दोनों को मार्गदर्शन मिलता है।
विशेष आवश्यकता वाले शिक्षार्थियों के लिए AI भाषा शिक्षण को अधिक समावेशी बनाता है। दृष्टिबाधित छात्रों के लिए टेक्स्ट-टू-स्पीच, श्रवण बाधित छात्रों के लिए स्पीच-टू-टेक्स्ट और अधिगम कठिनाई वाले छात्रों के लिए सरल भाषा एवं धीमी गति की सुविधा भाषा शिक्षा को लोकतांत्रिक बनाती है।
यद्यपि भाषा शिक्षण में AI की संभावनाएँ व्यापक हैं, किंतु इसकी कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती मानवीय संवेदना का अभाव है। भाषा केवल नियमों और संरचनाओं का समुच्चय नहीं, बल्कि भावना, संस्कृति और अनुभव की अभिव्यक्ति है। AI भावनाओं की गहराई और सांस्कृतिक संदर्भों को पूर्णतः नहीं समझ पाता। मुहावरे, लोकोक्तियाँ और साहित्यिक प्रतीक AI के लिए अब भी जटिल हैं।
अत्यधिक AI निर्भरता से छात्रों की रचनात्मकता और मौलिक चिंतन प्रभावित हो सकता है। यदि छात्र हर लेखन और उत्तर के लिए AI पर निर्भर हो जाए, तो उसकी स्वतंत्र सोच का विकास अवरुद्ध हो सकता है। इसके अतिरिक्त, डेटा गोपनीयता और नैतिकता भी एक गंभीर प्रश्न है। छात्रों की व्यक्तिगत जानकारी, लेखन और आवाज़ का सुरक्षित रहना अनिवार्य है।
तकनीकी असमानता भी AI आधारित भाषा शिक्षण की एक बड़ी चुनौती है। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों तक तकनीक की समान पहुँच न होना डिजिटल विभाजन को बढ़ाता है। साथ ही, सभी शिक्षकों का तकनीकी रूप से प्रशिक्षित न होना भी AI के प्रभावी प्रयोग में बाधक है।
भाषा शिक्षण में AI एक सशक्त साधन है, किंतु वह भाषा की आत्मा नहीं हो सकता। भाषा की आत्मा—संवेदना, संस्कृति और मानवीय अनुभव में निहित है। भाषा शिक्षण में AI एक अवसर भी है और चुनौती भी। यह शिक्षक और शिक्षार्थी दोनों के लिए नए द्वार खोलता है, किंतु विवेकहीन प्रयोग भाषा की आत्मा को क्षति पहुँचा सकता है। अतः आवश्यक है कि हम तकनीक को अपनाएँ, परंतु मानवता, संवेदना और संस्कृति को केंद्र में रखें। AI और मानव बुद्धि का संतुलित समन्वय ही भाषा शिक्षण को सार्थक और प्रभावी बना सकता है।
भाषा का उद्देश्य केवल सही बोलना या लिखना नहीं, बल्कि सार्थक संवाद और मानवीय जुड़ाव है—और यही उद्देश्य AI के साथ भी सुरक्षित रहना चाहिए।
अतः आवश्यक है कि भाषा शिक्षण में AI को शिक्षक के स्थान पर नहीं, बल्कि शिक्षक के सहायक के रूप में अपनाया जाए। तकनीक और मानवीय संवेदना का संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है। नीति, नैतिकता और प्रशिक्षण के माध्यम से ही AI का सकारात्मक और सार्थक उपयोग संभव है।
जब मानवता संग तकनीक का हो सुमेल,
तब शिक्षण बने जीवन का उज्ज्वल खेल।
भाषा रहे संवेदना की मधुर पहचान,
AI बने साधन, गुरु रहे मूल आधार।
डॉ नीरू मोहन
भाषा शिक्षक, विषय विशेषज्ञ
विभागाध्यक्ष : देव समाज मॉडर्न स्कूल नेहरू नगर, दिल्ली