नव वर्ष मंगलमय
देव-शिक्षा की धरा पर, ज्ञान-दीप अनवरत जले,
गुरु-करुणा की ज्योति से, तम के बादल सब टले।
शब्द बने सरस्वती, कर्म बने गीता का सार,
सेवा-भाव से सिंचित हो, विद्यालय का हर संस्कार।
शिक्षक—शिल्पी भविष्य के, शिष्य-मन के शिल्पकार,
धैर्य, तप और स्नेह लिए, गढ़ते जीवन का आकार।
अन्य सदस्य—मौन साधक, पर श्रम उनका वंदनीय,
उनके बिना यह यज्ञ-स्थल, कैसे हो पावन, कैसे हो रमणीय।
नव वर्ष लाए नव चेतना, नव संकल्प, नव विश्वास,
सफलता के पुष्प खिले, हर कक्षा, हर प्रयास।
वाणी में माधुर्य बसे, दृष्टि में हो उजास,
समय नमन करे चरणों में, ऐसा हो हर विकास।
वेदों की वाणी, विज्ञान की दृष्टि,
संस्कारों की सुगंध, आधुनिकता की सृष्टि—
इन सबका सुंदर संगम हो, देव समाज की पहचान,
भारत का उज्ज्वल भविष्य गढ़े, यह पावन संस्थान।
नव वर्ष मंगलमय हो, सुख-शांति का हो विस्तार,
देव समाज विद्यालय रहे, युग-युग तक ज्ञान का द्वार।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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