नव वर्ष पर दोहा छंद
नव दीप जले मन-देश में, मिटे निराशा-घेर।
कर्म-पथ पर दृढ़ चलें हम, उजले हों हर फेर।
नव वर्ष – दोहा छंद कविता
नव वर्ष का दीप जले, मन-आँगन उजियारा हो,
बीते कल की धूल धुएँ में, हर भय आज निवारा हो।
संकल्प-सलिल में डूबे मन, आशा का दीपक थामे,
कर्म-पथ पर बढ़ते जाएँ, जीवन फिर से सँवारा हो।
खुशियों की लौ स्थिर रहे, न टूटे विश्वास कहीं,
परिश्रम की बाती से ही, जगमग हो हर आस यहीं।
नव प्रभात के संग लिखें, हम प्रेम-सफलता की गाथा,
दीया-सा जलता जीवन हो, अंधियारा दूर रहे यहीं।
नव वर्ष – सौरठ छंद
आशा के दीप जलाइए, नव वर्ष लाए उजास।
कर्म-सुगंध से भर उठे, जीवन की हर श्वास।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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