Wednesday, 31 December 2025

देव समाज विद्यालय रहे, युग-युग तक ज्ञान का द्वार।

नव वर्ष मंगलमय 

देव-शिक्षा की धरा पर, ज्ञान-दीप अनवरत जले,

गुरु-करुणा की ज्योति से, तम के बादल सब टले।

शब्द बने सरस्वती, कर्म बने गीता का सार,

सेवा-भाव से सिंचित हो, विद्यालय का हर संस्कार।

शिक्षक—शिल्पी भविष्य के, शिष्य-मन के शिल्पकार,

धैर्य, तप और स्नेह लिए, गढ़ते जीवन का आकार।

अन्य सदस्य—मौन साधक, पर श्रम उनका वंदनीय,

उनके बिना यह यज्ञ-स्थल, कैसे हो पावन, कैसे हो रमणीय।

नव वर्ष लाए नव चेतना, नव संकल्प, नव विश्वास,

सफलता के पुष्प खिले, हर कक्षा, हर प्रयास।

वाणी में माधुर्य बसे, दृष्टि में हो उजास,

समय नमन करे चरणों में, ऐसा हो हर विकास।

वेदों की वाणी, विज्ञान की दृष्टि,

संस्कारों की सुगंध, आधुनिकता की सृष्टि—

इन सबका सुंदर संगम हो, देव समाज की पहचान,

भारत का उज्ज्वल भविष्य गढ़े, यह पावन संस्थान।

नव वर्ष मंगलमय हो, सुख-शांति का हो विस्तार,

देव समाज विद्यालय रहे, युग-युग तक ज्ञान का द्वार।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

नव वर्ष – धनाक्षरी छंद

 नव वर्ष – धनाक्षरी छंद कविता

नव प्रभात की लालिमा, मन में भर दे आस,

कर्म-दीप की ज्योति जले, मिट जाए हर त्रास।

श्रद्धा-साहस साथ लिए, बढ़ें सत्य के पास,

नव वर्ष रचे उजियारा, हो जीवन में प्रकाश।

बीते दुख की छाया छोड़, हँसकर आगे बढ़,

परिश्रम की नाव लिए, भव-सागर से न डर।

संकल्पों की पतवार से, टूटे हर जड़,

नव पथ पर चलता मानव, पाए मंगल-घर।

करुणा का स्वर गूँज उठे, हर उर में दिन-रात,

सेवा-सुमन से महके, जीवन की हर बात।

ज्ञान-सुधा का पान करें, मिटे अज्ञान की रात,

नव वर्ष बने वरदान, सफल हो हर प्रयास।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

नव वर्ष – सौरठ छंद

आशा के दीप जलाइए, नव वर्ष लाए उजास।

कर्म-सुगंध से भर उठे, जीवन की हर श्वास।

बीते दुख को छोड़कर, थामें नव विश्वास।

मेहनत के उजले पथ पर, मिल जाए हर प्रयास।

करुणा का दीप सँजोए, प्रेम रहे आसपास।

वाणी में मधुरता बसे, मिट जाए हर अवसाद।

सत्य-साहस के साथ ही, बढ़ते रहें हम खास।

सेवा-संकल्प अपनाएँ, बने समय का प्रकाश।

ज्ञान-पथ पर दीप जले, दूर रहे अज्ञान।

नव वर्ष बने मंगलमय, सधे जीवन की तान।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

नव वर्ष मंगलमय हो... दीया-सा जलता जीवन हो

 नव वर्ष पर दोहा छंद

नव दीप जले मन-देश में, मिटे निराशा-घेर।

कर्म-पथ पर दृढ़ चलें हम, उजले हों हर फेर।


नव वर्ष – दोहा छंद कविता

नव वर्ष का दीप जले, मन-आँगन उजियारा हो,

बीते कल की धूल धुएँ में, हर भय आज निवारा हो।

संकल्प-सलिल में डूबे मन, आशा का दीपक थामे,

कर्म-पथ पर बढ़ते जाएँ, जीवन फिर से सँवारा हो।

खुशियों की लौ स्थिर रहे, न टूटे विश्वास कहीं,

परिश्रम की बाती से ही, जगमग हो हर आस यहीं।

नव प्रभात के संग लिखें, हम प्रेम-सफलता की गाथा,

दीया-सा जलता जीवन हो, अंधियारा दूर रहे यहीं।


नव वर्ष – सौरठ छंद

आशा के दीप जलाइए, नव वर्ष लाए उजास।

कर्म-सुगंध से भर उठे, जीवन की हर श्वास।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

नव वर्ष मंगलकामना

नव वर्ष आपके जीवन में नई ऊर्जा, नई दृष्टि और नए उत्साह का संचार करे। बीते अनुभव आपको विवेक दें और आने वाले दिन आशा व आत्मविश्वास से भर दें। आपके विचारों में स्पष्टता, वाणी में मधुरता और कर्मों में सच्चाई सदा बनी रहे। यह वर्ष आपके परिश्रम को पहचान दे, प्रयासों को दिशा दे और सपनों को साकार करने की शक्ति प्रदान करे। आपके जीवन-पथ पर स्वास्थ्य, शांति, समृद्धि और संतोष के दीप निरंतर प्रज्वलित रहें तथा आप अपने प्रकाश से स्वयं को ही नहीं, दूसरों के जीवन को भी आलोकित करते रहें। यही नव वर्ष की हार्दिक मंगलकामना है। 

नव वर्ष मंगलमय हो जाए...कविता

 नव वर्ष आपके जीवन में

सूर्योदय-सा उजास लाए,

हर सुबह आशा की किरण बन

मुस्कान के पुष्प खिलाए।


समय चरणों में दीप रखे,

सफलता स्वयं पथ दिखाए,

कर्म-सुगंध से महके जीवन,

हर स्वप्न साकार हो जाए।


वाणी में वीणा का माधुर्य,

मन में गंगा-सी शांति हो,

बुद्धि में सरस्वती का वास,

कर्म में गीता की क्रांति हो।


संकल्प हिमालय-से अडिग हों,

श्रद्धा सागर-सी गहरी हो,

नव वर्ष बने वरदान ऐसा,

हर दिशा प्रगति से भरी हो।


आपका जीवन दीप बने,

जो स्वयं जले, जग को उजियाए—

इन्हीं मंगल भावनाओं संग

नव वर्ष मंगलमय हो जाए।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

ग़ज़ल : नव सवेरा

 ग़ज़ल : नव सवेरा

नए साल की दस्तक है, दिल में उजाला आया है,
गुज़रे लम्हों की राख से, फिर एक ख़्वाब उग आया है।

शिकवे–गिले की गर्द को, आज हवा में उड़ने दो,
उम्मीदों का हर एक दीया, रौशन बे-मिसाल आया है।

थी जो रात उदासियों की, अब सहर मुस्कुराने लगी,
हौसलों के हर नक़्शे में, सब्र का कमाल आया है।

ज़ख़्म जो वक़्त ने दिए थे, मरहम बनकर भर जाएँ,
दुआओं की चादर ओढ़े, इश्क़ का सवाल आया है।

चलो आज फिर से लिख दें, तक़दीर अपने हाथों से,
नए साल की तहरीर में, मेहनत का ख्याल आया है।

नीरू, हर एक दिल में अब, अम्न का पैग़ाम रहे,
इंसानियत की महफ़िल में, मोहब्बत का जलाल आया है।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन