Sunday, 23 August 2026

“कीचड़ में छिपा हुआ आकाश”

 “कीचड़ में छिपा हुआ आकाश”

“जिसे हम कीचड़ समझकर पैरों तले रौंद देते हैं, वही अपने भीतर किसी फूल का भविष्य छिपाए बैठा होता है…”


मुझे देखकर लोग नाक सिकोड़ते हैं।


मुझे कोई छूना नहीं चाहता।


कोई मेरे पास से गुजरता है तो अपने पाँव बचाकर चलता है, जैसे मैं कोई अपराध हूँ।


लेकिन मैं हमेशा ऐसा नहीं था।


मैं कभी मिट्टी था।


सोंधी, मुलायम और शांत।


फिर एक दिन आकाश ने अपनी मुट्ठी खोल दी।


बारिश आई।


उसने मुझे भिगोया।


मैं उसके साथ बहा, फिसला, घुला और बदलता गया।


मिट्टी और पानी के इस मिलन से मेरा जन्म हुआ।


बारिश ने हँसकर पूछा—


“अब बताओ, तुम्हारा नाम क्या है?”


मैंने कहा—


“तुमने मुझे बनाया है, तुम ही नाम रख दो।”


वह बोली—


“कीचड़।”


मैं चुप रहा।


नाम सुनकर अच्छा नहीं लगा।


मुझे लगा, यह कैसा नाम है!


इतने प्यार से बनाया और नाम ऐसा?


बारिश आगे बढ़ गई।


मैं वहीं रह गया।


कुछ दिन बाद मेरे भीतर से एक छोटी-सी हरी नोक बाहर निकली।


मैं घबरा गया।


“तुम कौन हो?”


वह बोली—


“बीज हूँ।”


मैंने कहा—


“यहाँ क्यों आई हो? लोग मुझे गंदा कहते हैं।”


बीज हँसा।


“इसीलिए तो आई हूँ।”


“मुझमें?”


“हाँ, तुममें।”


मैंने पहली बार अपने भीतर झाँका।


मुझे लगा, शायद मेरे भीतर भी कुछ है।


दिन बीते।


वह नन्ही-सी नोक पौधा बन गई।


फिर उसके ऊपर फूल आया।


एक दिन हवा आई।


उसने फूल को देखकर कहा—


“बहुत सुंदर हो।”


फूल ने सिर झुकाकर कहा—


“मेरा जन्म कहाँ हुआ, यह मत पूछना।”


हवा ने पूछा—


“क्यों?”


फूल मुस्कुराया—


“लोग मेरे रंग की प्रशंसा करेंगे, मेरे जन्म की नहीं।”


मैं चुप रहा।


मेरे भीतर कुछ हिलने लगा था।


मैंने पहली बार समझा—


शायद सुंदर चीज़ों को सुंदर बनाने में मेरा भी थोड़ा हिस्सा है।


कुछ दिनों बाद गर्मी आई।


सूरज ने मुझे सुखाना शुरू कर दिया।


मैंने बारिश को पुकारा—


“वापस आओ!”


बारिश दूर से बोली—


“हर बार मैं तुम्हें बचाने नहीं आ सकती।”


मैं डर गया।


“तो मैं खत्म हो जाऊँगा?”


बारिश बोली—


“नहीं।


तुम फिर मिट्टी बनोगे।”


मैंने पूछा—


“और फिर?”


वह बोली—


“फिर कभी बीज तुम्हारे भीतर घर बनाएगा।”


मैं बहुत देर तक चुप रहा।


अब मुझे अपने नाम से शिकायत नहीं थी।


फिर एक दिन नदी आई।


वह मुझे अपने साथ बहा ले गई।


मैंने पूछा—


“कहाँ ले जा रही हो?”


नदी बोली—


“समुद्र तक।”


मैंने कहा—


“लेकिन मैं तो कीचड़ हूँ। समुद्र में मेरा क्या काम?”


नदी हँसी।


“तुम्हें हर जगह अपना काम दिखाई नहीं देता।”


मैं उसके साथ बहता रहा।


रास्ते में उसने मुझे किनारे छोड़ा।


वहाँ सूखी धरती थी।


मैंने उसे छुआ।


धरती ने कुछ नहीं कहा।


बस चुपचाप मुझे अपने भीतर ले लिया।


कुछ महीनों बाद वहाँ हरी घास थी।


फिर फूल।


फिर पेड़।


मैं उन्हें देखता रहा।


किसी ने मेरा नाम नहीं लिया।


किसी ने यह नहीं कहा—


“देखो, यह कीचड़ की देन है।”


और शायद यही सबसे सुंदर बात थी।


मैंने उस दिन जाना—


हर अच्छी चीज़ को अपना नाम लिखवाने की जरूरत नहीं होती।


मैं कीचड़ हूँ।


मैं रास्ते रोकता हूँ।


पाँव गंदे करता हूँ।


फिसलाता हूँ।


कभी-कभी परेशानी भी बनता हूँ।


लेकिन मैं यह भी जानता हूँ—


मैं मिट्टी और पानी के बीच की वह अवस्था हूँ, जहाँ से जीवन कई बार जन्म लेता है।


इसलिए अब जब बारिश मुझे फिर से बनाती है, मैं उससे अपना नाम नहीं पूछता।


बस मुस्कुराकर कहता हूँ—


“मुझे फिर से कीचड़ बना दो।”


क्योंकि अब मुझे मालूम है—


मेरा अस्तित्व सुंदर दिखने के लिए नहीं है।


मेरा काम किसी सुंदर चीज़ के जन्म की जगह बनना है।


और शायद प्रकृति का सबसे बड़ा रहस्य यही है—


जिसे दुनिया बेकार समझकर किनारे कर देती है,

प्रकृति उसी में अगली सृष्टि का बीज छिपा देती है।


मैं कीचड़ हूँ।


मुझे देखकर मत घबराना।


कभी ध्यान से देखना—


शायद तुम्हारे पैरों के नीचे

किसी फूल का भविष्य पड़ा हो।

कीचड़ में खिला नाम

 कीचड़ में खिला नाम


शहर में उस दिन बारिश नहीं हुई थी।


फिर भी सड़क पर कीचड़ था।


अजीब बात यह थी कि कीचड़ सड़क पर कम और लोगों की बातचीत में ज्यादा था।


सुबह से एक ही खबर हवा में तैर रही थी—


“शर्मा जी ने चोरी की है।”


किसने कहा था?


किसी को मालूम नहीं।


किसने देखा था?


किसी ने नहीं।


लेकिन शाम तक पूरी कॉलोनी में यह तय हो चुका था कि शर्मा जी चोर हैं।


शर्मा जी सरकारी स्कूल में चपरासी थे।


ईमानदार इतने कि लोग उनकी ईमानदारी की भी शिकायत करते थे।


“अरे भाई, थोड़ा बहुत तो आदमी अपने लिए रखता ही है!”


मगर शर्मा जी ने कभी कुछ नहीं रखा।


सिवाय अपनी पुरानी साइकिल के।


वह साइकिल भी ऐसी थी कि उसे देखकर चोर भी कहता—


“इसमें चोरी करने लायक बचा ही क्या है?”


उस दिन स्कूल में प्रधानाचार्य की अलमारी से पचास हजार रुपये गायब हो गए।


सबकी नजर शर्मा जी पर गई।


क्यों?


क्योंकि चाबी उन्होंने संभालकर रखी थी।


बस।


गरीब आदमी के खिलाफ सबूत जुटाना बहुत आसान होता है—उसका गरीब होना ही काफी है।


अगले दिन शर्मा जी को स्कूल से निलंबित कर दिया गया।


मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो गई।


“हम तो पहले से जानते थे…”


“चेहरा ही ऐसा है…”


“इतना सीधा भी कोई होता है?”


शर्मा जी चुप रहे।


उन्होंने किसी सफाई की कोशिश नहीं की।


बस रोज सुबह स्कूल के बाहर वाली सड़क पर पड़े कीचड़ को अपनी पुरानी चप्पल से किनारे करते रहे।


एक दिन उनका दस साल का बेटा बोला—


“बाबूजी, आप सफाई क्यों करते हैं? लोग तो आपको ही गंदा कह रहे हैं।”


शर्मा जी हँस दिए।


“बेटा, रास्ते का कीचड़ साफ करना आसान है।”


“फिर मुश्किल क्या है?”


“लोगों के मन का।”


कुछ दिन बाद पुलिस आई।


अलमारी फिर खोली गई।


पैसे वहीं थे।


पुरानी फाइलों के नीचे।


प्रधानाचार्य को याद ही नहीं रहा था कि उन्होंने पैसे वहाँ रखे थे।


पूरी कॉलोनी में सन्नाटा छा गया।


जिसे सब चोर कह रहे थे, वह निर्दोष निकला।


लेकिन तब तक शर्मा जी की नौकरी जा चुकी थी।


प्रतिष्ठा जा चुकी थी।


लोगों की नजर में उनकी ईमानदारी भी जा चुकी थी।


क्योंकि अफवाह की एक खासियत होती है—


वह सच से पहले पहुँचती है और माफी के बाद भी रहती है।


अगले रविवार कॉलोनी की समिति की बैठक बुलाई गई।


अध्यक्ष ने खड़े होकर कहा—


“हमें शर्मा जी से सार्वजनिक रूप से माफी माँगनी चाहिए।”


तालियाँ बजीं।


शर्मा जी पीछे बैठे रहे।


अध्यक्ष ने उन्हें आगे बुलाया।


“शर्मा जी, कहिए… आपको हमसे क्या शिकायत है?”


शर्मा जी ने जेब से एक कागज निकाला।


सबको लगा, शायद वे कोई शिकायत लिखकर लाए हैं।


उन्होंने कागज अध्यक्ष को पकड़ा दिया।


उस पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—


“मुझे चोर कहने वालों की सूची नहीं चाहिए।”


अध्यक्ष ने पूछा—


“फिर?”


शर्मा जी बोले—


“बस इतना लिख दीजिए कि अगली बार किसी गरीब पर कीचड़ उछालने से पहले… यह देख लिया जाए कि हाथ किसके हैं।”


कमरे में फिर सन्नाटा था।


तभी उनका बेटा पीछे से दौड़ता हुआ आया।


उसने कहा—


“बाबूजी!”


शर्मा जी ने मुड़कर देखा।


बेटे के हाथ में वही पुरानी चप्पल थी।


“यह मिल गई!”


“कहाँ?”


“स्कूल के पीछे।”


शर्मा जी ने चप्पल ली।


उसके नीचे मोटी परत में कुछ चिपका हुआ था।


उन्होंने खुरचकर देखा।


एक छोटा-सा पाँच सौ का नोट।


कमरे में बैठे सभी लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।


अध्यक्ष घबरा गया।


“तो… पैसे सच में…?”


शर्मा जी ने नोट को गौर से देखा और मुस्कुरा दिए।


“यह मेरा नहीं है।”


“फिर किसका है?”


शर्मा जी ने नोट वापस कीचड़ में फेंक दिया।


“जिसका भी हो… अब रहने दीजिए।”


सब चौंक गए।


उन्होंने धीरे से कहा—


“जिस कीचड़ में सच दबा हो, उसे खोदने से पहले यह तय कर लीजिए कि कहीं आपके अपने हाथ तो गंदे नहीं हो जाएँगे।”


और वह उठकर चले गए।


उस दिन पहली बार लोगों ने सड़क के कीचड़ को ध्यान से देखा।


उन्हें लगा—


कीचड़ गंदा जरूर होता है,

लेकिन हर कीचड़ में गिरा आदमी गंदा नहीं होता।


कभी-कभी…


गंदगी उस आदमी में नहीं होती जिस पर कीचड़ पड़ा है,

गंदगी उस हाथ में होती है जिसने कीचड़ उछाला है।

कीचड़ का आईना

 कीचड़ का आईना


बारिश उस शहर पर नहीं, जैसे लोगों के चेहरों पर बरसी थी।


सुबह से लगातार पानी गिर रहा था। सड़कें चमक रही थीं और गलियाँ कीचड़ से भर गई थीं। लोग कपड़े बचाते हुए निकल रहे थे—किसी को अपनी सफेदी पर दाग पसंद नहीं था।


चौराहे के पास एक बूढ़ा आदमी रोज की तरह अपनी छोटी-सी लकड़ी की कुर्सी पर बैठा था।


लोग उसे कीचड़ वाला बाबा कहते थे।


वह न कीचड़ साफ करता था, न किसी को रास्ता बताता था। बस बैठकर लोगों को देखता था।


उस दिन एक साहब बहुत संभलकर सड़क पार कर रहे थे। सफेद कुर्ता, चमचमाते जूते और हाथ में महँगा छाता।


अचानक उनका पैर फिसला।


धड़ाम!


वे सीधे कीचड़ में जा गिरे।


भीड़ हँस पड़ी।


साहब गुस्से में उठे और चिल्लाए—


“यह सड़क किसने बनाई है? इस शहर का कोई जिम्मेदार आदमी है या नहीं?”


बूढ़ा मुस्कुराया।


साहब ने उसे घूरकर पूछा—


“तुम हँस क्यों रहे हो?”


बूढ़े ने कहा,


“मैं आपके गिरने पर नहीं हँस रहा साहब… मैं तो यह देखकर हैरान हूँ कि कीचड़ आपके कपड़ों पर लगा है और शर्म आपको आ रही है।”


साहब कुछ समझे नहीं।


बूढ़ा आगे बोला—


“कीचड़ तो बेचारा मिट्टी और पानी का मेल है। असली कीचड़ तो हम अपने भीतर बनाते हैं।”


भीड़ चुप हो गई।


तभी एक बच्चा आया। उसने कीचड़ में पड़ा साहब का मोबाइल उठाया और उनकी ओर बढ़ा दिया।


साहब ने मोबाइल लिया और बिना धन्यवाद कहे आगे बढ़ गए।


बूढ़ा बच्चे को देखता रहा।


बच्चे ने पूछा—


“बाबा, आपने उन्हें कुछ कहा क्यों नहीं?”


बूढ़ा बोला—


“जिसे अपने कपड़ों का दाग दिखाई देता है, उसे अपने व्यवहार का दाग दिखाई देने में थोड़ा समय लगता है।”


अगले दिन बारिश रुक गई।


सड़क का कीचड़ सूखने लगा।


लेकिन उसी चौराहे पर एक नया दृश्य था।


वही साहब लौटे थे।


इस बार उनके हाथ में झाड़ू थी।


उन्होंने सड़क किनारे जमा कीचड़ हटाना शुरू किया।


लोग आश्चर्य से देखने लगे।


बूढ़ा अपनी कुर्सी पर बैठा मुस्कुरा रहा था।


साहब उसके पास आए और बोले—


“बाबा, कल समझ आया… कीचड़ सड़क पर कम था, मेरे भीतर ज्यादा।”


बूढ़े ने सिर उठाया।


“अब समझ आएगा कि सफाई सिर्फ सड़क की नहीं होती।”


साहब ने पूछा—


“और मन की सफाई कैसे होती है?”


बूढ़े ने सामने बहते नाले की ओर इशारा किया—


“जब आदमी अपने भीतर जमा गंदगी को पहचान ले, उसी दिन से सफाई शुरू हो जाती है।”


कुछ देर दोनों चुप रहे।


तभी वही बच्चा दौड़ता हुआ आया।


उसने कीचड़ में पड़े एक छोटे से पौधे को उठाया और सड़क के किनारे लगा दिया।


बूढ़े ने उसे देखा और कहा—


“देखो साहब… कीचड़ में भी कुछ उग सकता है।”


साहब ने पूछा—


“क्या?”


बूढ़ा मुस्कुराया—


“अगर कोई उसे सिर्फ गंदगी समझकर छोड़ न दे, तो उम्मीद।”


उस दिन पहली बार चौराहे पर लोगों ने कीचड़ से बचकर चलना बंद किया।


वे उसे देखने लगे।


क्योंकि उन्हें समझ आ गया था—


कीचड़ हमेशा रास्ते में नहीं होता…

कभी-कभी वह आईना बनकर सामने पड़ा होता है।

Tuesday, 18 August 2026

स्टैंडअप कॉमेडी : हँसते-हँसते जिंदगी की क्लास

 “दूसरों पर हँसना आसान है… असली मज़ा तो तब है, जब अपनी ही जिंदगी की गलतियों पर हँसना सीख जाएँ!” 😄

स्टैंडअप कॉमेडी : हँसते-हँसते जिंदगी की क्लास


आजकल जिंदगी में गंभीरता इतनी बढ़ गई है कि आदमी हँसते हुए भी सोचने लगता है—“कहीं लोग मुझे गैर-जिम्मेदार तो नहीं समझेंगे?”


इसी गंभीर जमाने में स्टैंडअप कॉमेडी ने आकर घोषणा कर दी है—

“भाइयो-बहनो! चिंता मत करो, जिंदगी की समस्याएँ खत्म नहीं कर सकते तो कम-से-कम उन पर हँस तो सकते हैं।”


और सच कहें तो स्टैंडअप कॉमेडी केवल चुटकुले सुनाने का नाम नहीं है। यह हमारे रोजमर्रा के जीवन की उन घटनाओं को मंच पर लाने की कला है, जिन्हें हम घर में झेलते हैं, बाहर छिपाते हैं और मंच पर सुनकर हँसते हैं।


मसलन, सुबह का अलार्म।


अलार्म रोज हमें जगाने की पूरी कोशिश करता है और हम रोज उसे बंद करके उसके आत्मसम्मान की धज्जियाँ उड़ा देते हैं। वह कहता है—“उठो, समय हो गया।”


हम कहते हैं—“पाँच मिनट और।”


अलार्म फिर बजता है।


हम फिर बंद करते हैं।


तीसरी बार अलार्म शायद मन ही मन कहता होगा—

“भाई, मैं अपना काम कर चुका हूँ। अब तुम्हारी जिंदगी तुम्हारी जिम्मेदारी है।”


लेकिन भारतीय घरों में अलार्म की भी अपनी सीमा है। जब माँ की आवाज आती है—“उठ रहे हो या पानी डालूँ?” तब तकनीक हार जाती है और परंपरा जीत जाती है।


स्टैंडअप कॉमेडी की असली ताकत यहीं है। वह किसी बड़ी घटना को मजेदार बनाने के बजाय छोटी-सी रोजमर्रा की सच्चाई को पकड़ लेती है।


परीक्षा से पहले का विद्यार्थी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।


पूरे साल किताब देखकर उसे नींद आती है और परीक्षा के एक दिन पहले वही किताब उसे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु दिखाई देने लगती है।


एक दिन पहले किताब खोलकर विद्यार्थी की आँखें फैल जाती हैं—


“इतना सारा सिलेबस! यह सब पढ़ना भी था?”


फिर पढ़ाई कम होती है और प्रार्थना अधिक—


“हे भगवान! इस बार पास करा दो, अगली बार पक्का पढ़ूँगा।”


भगवान भी शायद ऊपर से कह रहे हों—


“बेटा, यह डायलॉग पिछले पाँच साल से सुन रहा हूँ।”


मोबाइल ने तो स्टैंडअप कॉमेडी को और भी समृद्ध कर दिया है।


हम कहते हैं—“बस पाँच मिनट मोबाइल देखूँगा।”


पाँच मिनट बाद मोबाइल कहता है—


“आज आपका स्क्रीन टाइम छह घंटे है।”


हम मोबाइल को देखते हैं।


मोबाइल हमें देखता है।


और दोनों के बीच एक मौन संवाद होता है—


“हम यहाँ पहुँचे कैसे?”


विडंबना देखिए कि हम मोबाइल को स्मार्ट कहते हैं, लेकिन कई बार स्मार्टफोन हमें अपने से ज्यादा स्मार्ट बना देता है—वह हमारी पसंद जानता है, हमारी आदत जानता है, हमारी कमजोरी जानता है... बस यह नहीं जानता कि हमें पढ़ाई कब करनी चाहिए। 😄


स्टैंडअप कॉमेडी की एक खूबसूरत बात यह भी है कि इसमें कलाकार दूसरों पर हँसाने के बजाय अपने ऊपर हँसना सीखता है।


और अपने ऊपर हँसना आसान नहीं।


दूसरे की गलती पर हँसना तो दुनिया का सबसे आसान काम है। पड़ोसी की कार खराब हो जाए तो हम तुरंत विशेषज्ञ बन जाते हैं—


“मैंने तो पहले ही कहा था!”


लेकिन अपनी कार खराब हो जाए तो—


“भाई, मशीनरी चीज है... कभी भी धोखा दे सकती है।”


यही दोहरा व्यवहार स्टैंडअप कॉमेडी का मसाला बन जाता है।


हम चाहते हैं कि बच्चे आत्मविश्वासी बनें, लेकिन जैसे ही बच्चा मंच पर खड़ा होकर अपनी बात कहता है, हमारी पहली चिंता होती है—


“देखना, कुछ गलत न बोल दे।”


अरे भाई, अगर बच्चा गलती ही नहीं करेगा तो सीखेगा कैसे?


मंच पर खड़ा होना अपने आप में एक उपलब्धि है।


क्योंकि मंच पर आते ही बच्चे को तीन चीजें दिखाई देती हैं—


माइक,


दर्शक,


और अपनी सारी याददाश्त का अचानक गायब हो जाना! 😄


घर पर वही बच्चा आईने के सामने इतनी शानदार स्पीच देता है कि आईना भी सोचता है—


“देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में है।”


और मंच पर आते ही—


“मेरा... मेरा विषय... वो... मतलब... आज मैं...”


लेकिन यहीं से आत्मविश्वास जन्म लेता है।


स्टैंडअप कॉमेडी बच्चे को यह सिखाती है कि गलती से डरना नहीं है, गलती को संभालना है।


हँसी का अर्थ किसी का अपमान करना नहीं है।


सबसे अच्छी कॉमेडी वह है जिसमें दर्शक हँसकर कहे—


“अरे! यह तो मेरे साथ भी होता है।”


यही वह बिंदु है जहाँ हास्य व्यंग्य बन जाता है और व्यंग्य सीख।


किसी की भाषा, रंग, रूप, कमजोरी या परिस्थिति का मजाक उड़ाना आसान है। लेकिन अपनी आदतों पर हँसना, समाज की विसंगतियों को पहचानना और बिना किसी को चोट पहुँचाए बात कह देना—यह असली कला है।


इसलिए स्टैंडअप कॉमेडी को केवल मनोरंजन समझना भी उसके साथ अन्याय होगा।


यह एक तरह की सामाजिक आईना है।


बस फर्क इतना है कि आईना चेहरा दिखाता है...


और स्टैंडअप कॉमेडी हमारा व्यवहार।


वह पूछती है—


हम समय की कितनी कद्र करते हैं?


मोबाइल के कितने गुलाम हैं?


दूसरों से तुलना क्यों करते हैं?


असफलता से इतना डरते क्यों हैं?


और सबसे बड़ा सवाल—


क्या हम अपने ऊपर भी हँस सकते हैं?


क्योंकि जिस दिन इंसान अपनी कमियों को स्वीकार करके उन पर मुस्कुरा लेता है, उसी दिन उनमें सुधार की संभावना पैदा होती है।


शायद इसीलिए स्टैंडअप कॉमेडी का सबसे बड़ा संदेश यही है—


जिंदगी को बहुत गंभीरता से मत लीजिए।

लेकिन जिंदगी से मिलने वाली सीख को कभी हल्के में मत लीजिए।


हँसिए जरूर...


मगर किसी को गिराकर नहीं।


व्यंग्य कीजिए...


मगर संवेदना के साथ।


और मंच पर बोलिए...


मगर इतना सच बोलिए कि सामने बैठा व्यक्ति हँसते-हँसते मन ही मन कह उठे—


“ये तो मेरी ही कहानी सुना रहा है!”


आखिर जिंदगी भी तो एक स्टैंडअप कॉमेडी ही है।


फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें—


स्क्रिप्ट हमें नहीं मिलती,

पंचलाइन पहले से नहीं लिखी होती,

और दर्शक भी हम ही हैं...

और कलाकार भी हम ही।


इसलिए जब जिंदगी अगली बार कोई मुश्किल परिस्थिति आपके सामने रखे तो घबराइए मत।


थोड़ा मुस्कुराइए...


उसे समझिए...


उससे सीखिए...


और अगर संभव हो तो—


उस पर एक अच्छा-सा जोक भी बना लीजिए।


क्योंकि समस्या से बड़ी चीज समाधान है...


और समाधान न मिले तो कम-से-कम हँसने की वजह खोज लेना भी कम उपलब्धि नहीं है।

©️ डॉ नीरू मोहन 

हास्य विनोद

 1. अलार्म और हमारा रिश्ता 😄

“मैंने सुबह जल्दी उठने के लिए पाँच अलार्म लगाए।

पहला अलार्म बजा—मैंने बंद कर दिया।

दूसरा बजा—वो भी बंद।

तीसरा बजा—उससे भी मेरी दोस्ती खत्म।

चौथा बजा तो मैंने सोचा—कल से पक्का जल्दी उठूँगा।

पाँचवाँ बजा तो माँ आ गईं।

तब समझ आया कि तकनीक चाहे कितनी भी विकसित हो जाए, भारतीय माँ के सामने कोई अलार्म टिक नहीं सकता।”

सीख: समय की कीमत समझना।

2. परीक्षा की तैयारी 😂

“परीक्षा से एक महीना पहले हम कहते हैं—बहुत समय है।

पंद्रह दिन पहले—अभी तो बहुत समय है।

एक सप्ताह पहले—चलो शुरू करते हैं।

एक दिन पहले किताब खोलकर लगता है—

‘हे भगवान! ये सब मेरे सिलेबस में था?’

और फिर हम पढ़ाई कम और भगवान से बातचीत ज्यादा करते हैं।”

सीख: आखिरी समय पर निर्भर रहने के बजाय नियमित तैयारी।

3. होमवर्क का सार्वभौमिक बहाना

“मैडम ने पूछा—होमवर्क कहाँ है?

मैंने कहा—मैम, मैंने किया था।

मैडम—तो कॉपी कहाँ है?

मैं—मैम... कॉपी घर पर है।

मैडम—तो घर क्यों नहीं हो?

मैं—मैम... मैं भी यही सोच रहा हूँ!” 😂

सीख: बहाने बनाने में जितनी बुद्धि लगती है, उतनी होमवर्क में लगा दें तो जीवन आसान हो जाए।

4. मोबाइल का पाँच मिनट 📱

“माँ कहती हैं—बस पाँच मिनट मोबाइल चलाओ।

मैं कहता हूँ—ठीक है।

पाँच मिनट बाद मैं मोबाइल देखता हूँ...

तो मोबाइल कहता है—‘आपका स्क्रीन टाइम आज 6 घंटे 42 मिनट है।’

मैं मोबाइल को देखता हूँ...

मोबाइल मुझे देखता है...

और दोनों के बीच एक ही सवाल होता है—

‘हम यहाँ पहुँचे कैसे?’ 😂

सीख: तकनीक हमारी सुविधा है, मालिक नहीं।

5. मम्मी की याददाश्त

“मुझे अपने जन्मदिन पर क्या चाहिए, यह मैं भूल सकता हूँ।

लेकिन मम्मी को तीन साल पहले की मेरी एक गलती याद है!

मैंने कहा—मम्मी, आपको सब कैसे याद रहता है?

मम्मी बोलीं—

‘बच्चे पैदा किए हैं, हार्ड डिस्क नहीं।’ 😂

सीख: माता-पिता के अनुभव और अनुशासन की कीमत समझना।

6. दोस्ती और टिफिन

“स्कूल में दोस्ती की शुरुआत अक्सर नाम से नहीं होती।

शुरुआत होती है—

‘भाई, टिफिन में क्या लाया है?’

फिर दोस्त पूछता है—

‘थोड़ा दूँ?’

और थोड़ा इतना होता है कि आपका पूरा टिफिन इतिहास बन जाता है।

फिर आप पूछते हैं—

‘मेरा वापस?’

दोस्त कहता है—

‘दोस्ती में हिसाब रखते हो?’ 😂

सीख: दोस्ती बाँटने से बढ़ती है, लेकिन अपना टिफिन बचाना भी जरूरी है!

7. मंच का डर 🎤

“मुझे मंच पर बोलने से बहुत डर लगता था।

घर पर अकेले मैं इतनी अच्छी स्पीच देता था कि मुझे खुद लगता था—

‘वाह! क्या वक्ता हूँ!’

फिर मंच पर आया...

सामने 100 लोग बैठे थे।

दिमाग ने कहा—

‘भाई, हमसे गलती हो गई। वापस चलते हैं।’ 😂

लेकिन जैसे ही बोलना शुरू किया, डर कम होने लगा।

तब समझ आया—

आत्मविश्वास डर के खत्म होने से नहीं, डर के बावजूद आगे बढ़ने से आता है।”

8. तुलना का मजेदार अनुभव

“घर में किसी रिश्तेदार का बच्चा 95% ले आए तो पूछा जाता है—

‘देखो, उसने कितने नंबर लिए!’

मैंने कहा—

‘मम्मी, वो 95 लाया है, मैं 75।’

मम्मी बोलीं—

‘तुम उससे सीखो।’

मैंने कहा—

‘मम्मी, फिर उसके घर भी जाकर रह लूँ क्या?’” 😂

सीख: तुलना के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार बेहतर बनने की कोशिश करें।

9. असफलता पर छोटा स्टैंडअप

“एक बार मैं किसी प्रतियोगिता में हार गया।

पहले लगा—सब खत्म।

फिर घर जाकर मम्मी ने कहा—

‘कोई बात नहीं।’

पापा ने कहा—

‘अगली बार और मेहनत करना।’

और दोस्त ने कहा—

‘चल, समोसा खाते हैं।’

उस दिन समझ आया—

हर समस्या का समाधान समोसा नहीं होता... लेकिन समोसा समस्या को थोड़ी देर के लिए कम जरूर कर देता है! 😂

सीख: असफलता अंत नहीं, अगली कोशिश की शुरुआत है।

10. सबसे अच्छा—अपने ऊपर हँसना

बच्चों के लिए सबसे सुंदर स्टैंडअप यही हो सकता है कि वे दूसरों का मज़ाक उड़ाने के बजाय अपनी ही आदतों पर हास्य करें।

जैसे—

“मैं बहुत अनुशासित बच्चा हूँ।

मेरा टाइमटेबल इतना शानदार है कि मैं उसे रोज बनाता हूँ...

और फिर रोज उसे फॉलो नहीं करता!” 😂

और अंत में:

“लेकिन अब मैंने तय किया है कि टाइमटेबल को सजाने के बजाय थोड़ा-सा पालन भी करूँगा!”

इस तरह हँसी भी आती है और संदेश भी जाता है।

एक छोटा-सा फॉर्मूला बच्चों को दे सकते हैं:

घटना → अपनी प्रतिक्रिया → हास्यास्पद मोड़ → पंचलाइन → छोटी-सी सीख

उदाहरण:

घटना: परीक्षा में देर से पहुँचा।

प्रतिक्रिया: बहुत घबराया।

मोड़: टीचर ने पूछा—देर क्यों हुई?

पंचलाइन: “मैम, मैं समय पर निकला था, लेकिन समय मुझसे पहले निकल गया!” 😄

सीख: समय का सम्मान जरूरी है।

यही तरीका बच्चों की कॉमेडी को साफ-सुथरा, मौलिक, जीवन से जुड़ा और वरिष्ठ दर्शकों के सामने भी प्रभावी बनाएगा।

Monday, 17 August 2026

“सबको संभालते-संभालते कहीं आप खुद तो नहीं बिखर रहे?”

 “हर मुस्कुराता चेहरा मज़बूत नहीं होता… कुछ चेहरे सिर्फ दर्द छिपाना जानते हैं।”


हर बार मज़बूत होना ज़रूरी नहीं


कभी-कभी हम सबको संभालते-संभालते खुद को संभालना भूल जाते हैं।

हर किसी की चिंता, हर रिश्ते की ज़िम्मेदारी और हर चेहरे की मुस्कान के पीछे छिपी अपनी थकान… धीरे-धीरे मन को भीतर से खाली करने लगती है।


हम हमेशा मज़बूत रहें—यह ज़रूरी नहीं।

कभी रुक जाना भी ज़रूरी है, कभी चुप होकर अपने मन की सुनना भी ज़रूरी है।


हर आँसू कमजोरी नहीं होता।

कुछ आँसू उन भावनाओं का बोझ हल्का करते हैं, जिन्हें हम बरसों से मुस्कान के पीछे छिपाए बैठे हैं।


इसलिए आज खुद से एक वादा कीजिए—

दुनिया को समझने से पहले खुद को समझेंगे।

सबका साथ देने से पहले खुद का हाथ थामेंगे।


क्योंकि जिंदगी सिर्फ दूसरों के लिए मजबूत बने रहने का नाम नहीं…

कभी-कभी अपने लिए भी सहारा बनना पड़ता है।


याद रखिए—

आपको हर दिन मजबूत दिखना नहीं है,

बस हर दिन खुद के साथ सच्चा रहना है।


©️ डॉ. नीरू मोहन


Sunday, 16 August 2026

“जो शिक्षक बच्चों का भविष्य सँवारता है, उसके संघर्ष को कौन समझता है?” ❤️

 “जो शिक्षक बच्चों का भविष्य सँवारता है, उसके संघर्ष को कौन समझता है?” ❤️


शिक्षक होना केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी और सौभाग्य है। शिक्षक अपने ज्ञान से बच्चों को पढ़ाते ही नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व, संस्कार और भविष्य को भी आकार देते हैं।


सुबह की तैयारी से लेकर कक्षा में बच्चों की ऊर्जा सँभालने तक और फिर घर लौटकर अगली कक्षा की तैयारी करने तक—एक शिक्षक का हर दिन समर्पण से भरा होता है।


शिक्षक राष्ट्र के भविष्य का निर्माता है।

आइए, उसके समय, श्रम और भावनाओं का सम्मान करें।


सम्मान दीजिए शिक्षक को, क्योंकि वह केवल पाठ नहीं पढ़ाता—जीवन पढ़ाता है। ❤️

Content: © Dr Neeru Mohan


Saturday, 15 August 2026

डॉ. नीरू मोहन : साहित्य, संवेदना और सामाजिक सरोकारों की सशक्त हस्ताक्षर

 डॉ. नीरू मोहन : साहित्य, संवेदना और सामाजिक सरोकारों की सशक्त हस्ताक्षर


डॉ. नीरू मोहन हिंदी साहित्य की उन रचनाकारों में हैं, जिनके लिए लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज, संवेदना और जीवन-सत्य को शब्द देने का माध्यम है। पिछले दो दशकों से निरंतर साहित्य-सृजन में सक्रिय डॉ. नीरू मोहन ने लेखन की अनेक विधाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उनकी रचनाओं में जीवन के विविध रंग, स्त्री-मन की पीड़ा और शक्ति, सामाजिक विसंगतियाँ, मानवीय रिश्तों की ऊष्मा तथा बदलते समय की सच्चाइयाँ सहजता और प्रभावशीलता के साथ अभिव्यक्त होती हैं।


राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर, हिंदी साहित्य में एम.फिल., शोधकार्य तथा अटल बिहारी वाजपेयी : ‘जीवन-सृजन एवं मूल्यांकन’ विषय में पीएच.डी. की  शैक्षिक पृष्ठभूमि ने उनके साहित्यिक चिंतन को व्यापक दृष्टि प्रदान की है। वे भाषा, शिक्षा, साहित्य और समाज को एक-दूसरे से जुड़ी हुई शक्तियों के रूप में देखती हैं। यही कारण है कि उनका लेखन केवल साहित्यिक सौंदर्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पाठक को सोचने, प्रश्न करने और आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित करता है।


डॉ. नीरू मोहन की साहित्यिक यात्रा अत्यंत समृद्ध और बहुआयामी है। उन्होंने लेख, आलेख, लघुकथा, संस्मरण, व्यंग्य, कविता, दोहा, ग़ज़ल, कहानी, बाल-कविता, बाल-कहानी, नाटक, नुक्कड़ नाटक, समीक्षा, निबंध और शोधपरक लेखन सहित अनेक विधाओं में सृजन किया है। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘नव प्रवर्तन’, ‘बूंद–बंद सागर’, जापानी काव्य शैली हाइकु से संबंधित कृति तथा सत्य घटनाओं पर आधारित ‘क्षितिज… एक अंतहीन सफर’ जैसे महत्वपूर्ण कार्य उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनात्मक पहुँच हिंदी से आगे बढ़कर अंग्रेजी रूपांतरण और डिजिटल माध्यमों तक भी दिखाई देती है।


विशेष रूप से उनकी रचनाओं में नारी जीवन और उसके संघर्षों की गहरी समझ दिखाई देती है। वे स्त्री को केवल करुणा की पात्र के रूप में नहीं, बल्कि संघर्ष करने वाली, निर्णय लेने वाली और अपने अस्तित्व की पहचान बनाने वाली सशक्त व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्य में समाज की विडंबनाओं पर तीखा व्यंग्य भी है और मानवीय संवेदनाओं को छू लेने वाली आत्मीयता भी।


उनकी साहित्यिक एवं सामाजिक सक्रियता को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों और मंचों ने सम्मानित किया है। उन्हें साहित्य संगम संस्थान का ‘भाषा भूषण सम्मान’, साहित्य संगम संस्थान का ‘वीणापाणि सम्मान’, काव्य रंगोली मातृभाषा गौरव सम्मान, सुपर एचीवर्स अवॉर्ड 2018, नारी शक्ति गौरव अवॉर्ड 2018, वुमन सेलिब्रिटीज 2018, विलक्षण समाज सारथी सम्मान 2018 तथा मिशन संस्थान द्वारा नारी गौरव सम्मान 2018 सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं। विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा उन्हें निर्णायक, मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि के रूप में भी आमंत्रित किया जाता रहा है।


डॉ. नीरू मोहन साहित्य के साथ-साथ भाषायी, शैक्षिक और सामाजिक गतिविधियों से भी सक्रिय रूप से जुड़ी हैं। वे ‘भाषायी साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थान’ से संबद्ध हैं तथा विभिन्न साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्थाओं में महत्वपूर्ण दायित्व निभा रही हैं। उनकी सक्रियता यह प्रमाणित करती है कि उनके लिए साहित्य केवल पुस्तक के पन्नों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के बीच जाकर परिवर्तन की चेतना जगाने का माध्यम है।


उनकी रचनात्मक पहचान का सबसे सुंदर पक्ष यह है कि वे गंभीर विषयों को भी सरल, सहज, संवेदनशील और प्रभावशाली भाषा में पाठकों तक पहुँचाती हैं। उनके लेखन में कहीं माँ की ममता है, कहीं स्त्री का स्वाभिमान, कहीं रिश्तों की टूटन का दर्द, कहीं सामाजिक व्यवस्था पर व्यंग्य और कहीं जीवन को नए अर्थों में देखने की प्रेरणा।


डॉ. नीरू मोहन केवल लेखिका नहीं, बल्कि शब्दों के माध्यम से समाज की धड़कनों को सुनने वाली संवेदनशील रचनाकार हैं। उनका साहित्य जीवन के उन अनकहे पक्षों को आवाज देता है, जिन्हें अक्सर समाज सुनकर भी अनसुना कर देता है। उनकी लेखनी में संवेदना है, प्रश्न हैं, प्रतिरोध है, व्यंग्य है और सबसे बढ़कर—मनुष्य और मनुष्यता में विश्वास है।


इसी बहुआयामी रचनात्मकता, सामाजिक प्रतिबद्धता और साहित्य के प्रति निरंतर समर्पण ने डॉ. नीरू मोहन को हिंदी साहित्य जगत में एक विशिष्ट और सशक्त पहचान प्रदान की है।


उपन्यास ‘निरुपमा’


सच्ची घटनाओं और वास्तविक पात्रों पर आधारित एक संवेदनशील सामाजिक उपन्यास


साहित्य केवल कल्पना का संसार नहीं होता। कई बार साहित्य जीवन की उन सच्चाइयों को शब्द देता है, जिन्हें मनुष्य अपने भीतर दबाकर जीता रहता है। कुछ कहानियाँ लिखी नहीं जातीं, बल्कि जीवन स्वयं उन्हें रचता है। ‘निरुपमा’ ऐसी ही एक कथा है।


‘निरुपमा’ — केवल एक कहानी नहीं, जीवन का आईना


‘निरुपमा’ नारी के जीवन, उसके संघर्ष, उसकी पीड़ा, उसके आत्मसम्मान और उसके अस्तित्व की लड़ाई का सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है।


यह उपन्यास केवल एक स्त्री की कहानी नहीं है। इसके भीतर आज का समाज दिखाई देता है—वह समाज जहाँ रिश्तों की परिभाषाएँ बदल रही हैं, जहाँ अपने और पराए के बीच की रेखा धुंधली हो रही है और जहाँ कभी-कभी सबसे गहरे घाव उन्हीं लोगों से मिलते हैं, जिन्हें हम अपना समझते हैं।


इस उपन्यास में समाज की संकीर्ण सोच, माता-पिता का बदलता व्यवहार, भाई-बहन के रिश्तों की सच्चाई, नारी का नारी के प्रति द्वेष, सास-बहू के बीच की खाई, अपने ही खून के रिश्तों से मिलने वाला धोखा, लालच, स्वार्थ और दुष्टता की पराकाष्ठा जैसे अनेक सामाजिक यथार्थ सामने आते हैं।


इन घटनाओं को पढ़ते हुए पाठक केवल कहानी का हिस्सा नहीं बनता, बल्कि स्वयं से प्रश्न करने लगता है—क्या रिश्ते वास्तव में उतने ही सच्चे हैं, जितने दिखाई देते हैं?


वास्तविक पात्रों की वास्तविक कहानी


‘निरुपमा’ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके पात्र काल्पनिक नहीं हैं। वे वास्तविक जीवन से जुड़े वास्तविक पात्र हैं।


यह उपन्यास किसी कल्पित संसार की रचना मात्र नहीं है। इसके पात्रों के जीवन, उनके व्यवहार, उनके संबंध और उनसे जुड़ी घटनाएँ वास्तविक जीवन की अनुभूतियों और सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं।


इसीलिए इस उपन्यास के पात्र पाठक को असाधारण रूप से जीवंत लगते हैं। वे किसी कल्पना की दुनिया में दूर खड़े चरित्र नहीं हैं, बल्कि ऐसे लोग हैं जिन्हें पाठक अपने आसपास महसूस कर सकता है।


कभी कोई पात्र अपने घर का लगता है, कभी कोई अपना रिश्तेदार दिखाई देता है और कभी किसी घटना में पाठक को अपनी ही जिंदगी की कोई भूली हुई पीड़ा दिखाई देने लगती है।


मुख्य पुरुष पात्र — कैंसर से संघर्ष करता एक जीवन


‘निरुपमा’ की कथा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील पक्ष है इसका मुख्य पुरुष पात्र, जो कैंसर से पीड़ित है।


कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से संघर्ष करते हुए उसका जीवन केवल बीमारी की कहानी नहीं रह जाता। उसके शरीर के साथ-साथ उसका मन, उसका परिवार और उसके रिश्ते भी परीक्षा से गुजरते हैं।


बीमारी के समय मनुष्य को केवल दवाओं और उपचार की आवश्यकता नहीं होती, उसे अपनेपन, विश्वास और भावनात्मक सहारे की भी आवश्यकता होती है। लेकिन जब जीवन की सबसे कठिन घड़ी में अपने ही रिश्ते सवालों के घेरे में खड़े हो जाएँ, तब संघर्ष और भी गहरा हो जाता है।


उपन्यास में कैंसर पीड़ित इस मुख्य पुरुष पात्र के माध्यम से बीमारी, जीवन-संघर्ष, पारिवारिक संबंधों, संवेदना, स्वार्थ और मनुष्य के वास्तविक चेहरे को सामने लाने का प्रयास किया गया है।


यह पात्र पाठक को यह सोचने के लिए विवश करता है कि बीमारी केवल शरीर की परीक्षा नहीं होती—कई बार वह रिश्तों की भी परीक्षा बन जाती है।


निरुपमा — एक स्त्री की नहीं, अनेक स्त्रियों की कहानी


निरुपमा का जीवन उसके अपने संघर्षों से गुजरता है। उसे जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, वे केवल उसकी व्यक्तिगत पीड़ा नहीं रह जातीं।


उसके जीवन में आने वाले रिश्ते, उनसे मिलने वाला अपनापन और फिर उन्हीं रिश्तों में छिपा स्वार्थ—यह सब उस व्यापक सामाजिक यथार्थ को सामने लाता है जिसे अनेक स्त्रियाँ अपने जीवन में महसूस करती हैं।


निरुपमा के माध्यम से उस स्त्री की आवाज़ सामने आती है जो रिश्ते बचाते-बचाते स्वयं टूट जाती है, जो अपनों के लिए त्याग करती है और बदले में कभी-कभी उपेक्षा, अपमान अथवा विश्वासघात पाती है।


सबसे बड़ी विडंबना तब सामने आती है जब एक स्त्री दूसरी स्त्री की पीड़ा को समझने के बजाय उसकी राह में स्वयं बाधा बन जाती है।


नारी के प्रति नारी का द्वेष, सास-बहू के बीच बनी दूरी और स्त्री के जीवन में स्त्री द्वारा ही खड़ी की गई दीवारें इस उपन्यास को केवल पारिवारिक कथा न रहने देकर सामाजिक विमर्श का रूप देती हैं।


रिश्तों की असली परीक्षा


‘निरुपमा’ रिश्तों की चमकदार सतह के नीचे छिपी सच्चाई को सामने लाता है।


माता-पिता और संतान का रिश्ता हो, भाई-बहन का संबंध हो, पति-पत्नी का साथ हो अथवा सास-बहू का संबंध—हर रिश्ता किसी न किसी मोड़ पर परीक्षा से गुजरता है।


कई बार रक्त का रिश्ता भी स्वार्थ के सामने कमजोर पड़ जाता है और कभी कोई गैर व्यक्ति अपनेपन का ऐसा उदाहरण दे जाता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।


उपन्यास में अपने ही खून के रिश्तों से मिले धोखे का चित्रण पाठक को भीतर तक झकझोरता है। लालच जब रिश्तों पर हावी हो जाता है तो अपनापन पीछे छूट जाता है और मनुष्य अपने ही प्रियजनों के प्रति संवेदनहीन हो जाता है।


‘निरुपमा’ इसी कटु सत्य को बिना किसी बनावटी आवरण के पाठक के सामने रखता है।


पाठक को अपनी आपबीती क्यों दिखाई दे सकती है?


इस उपन्यास की सबसे बड़ी शक्ति इसकी जीवन से निकटता है।


इसे पढ़ते हुए पाठक को बार-बार यह महसूस हो सकता है कि यह केवल निरुपमा की कहानी नहीं है।


कहीं उसे अपना बचपन दिखाई देगा, कहीं अपने माता-पिता; कहीं भाई-बहन का रिश्ता, कहीं सास-बहू का संबंध; कहीं किसी अपने का दिया हुआ धोखा और कहीं वह दर्द जिसे उसने वर्षों से अपने भीतर छिपाकर रखा है।


यही वह बिंदु है जहाँ ‘निरुपमा’ एक व्यक्तिगत कथा से आगे बढ़कर सामूहिक अनुभव की कथा बन जाती है।


निरुपमा की पीड़ा में अनेक स्त्रियों की पीड़ा दिखाई देती है और मुख्य पुरुष पात्र के संघर्ष में उन परिवारों का दर्द दिखाई देता है जो गंभीर बीमारी और बदलते रिश्तों के बीच जीवन जीने के लिए संघर्ष करते हैं।


सच्ची घटना पर आधारित उपन्यास


‘निरुपमा’ की कथा का आधार सच्ची घटना है। इसके पात्र वास्तविक हैं और उनके जीवन से जुड़े अनुभव इस उपन्यास की संवेदना का आधार बने हैं।


इसलिए इसकी घटनाओं में कल्पना की चमक से अधिक जीवन की सच्चाई दिखाई देती है।


यह वही सच्चाई है जो कभी सुंदर नहीं होती, कभी कड़वी होती है, कभी मन को तोड़ती है और कभी मनुष्य को भीतर से मजबूत बना देती है।


उपन्यास के पात्र आज भी जीवंत हैं। यही कारण है कि कथा समाप्त होने के बाद भी वे पाठक के मन में बने रहते हैं।


समाज के सामने कुछ प्रश्न


‘निरुपमा’ केवल घटनाएँ नहीं सुनाता, बल्कि समाज से कुछ प्रश्न भी करता है—


क्या हर रक्त-संबंध वास्तव में अपना होता है?


क्या माता-पिता का प्रेम परिस्थितियों और स्वार्थ के साथ बदल सकता है?


क्या भाई-बहन का रिश्ता संपत्ति और लालच के आगे कमजोर पड़ सकता है?


क्यों एक स्त्री दूसरी स्त्री की पीड़ा को समझने के बजाय कभी-कभी उसकी सबसे बड़ी विरोधी बन जाती है?


बीमारी की घड़ी में रिश्तों का वास्तविक चेहरा क्यों सामने आता है?


और सबसे बड़ा प्रश्न—क्या मनुष्य कठिन परिस्थितियों में भी अपने आत्मसम्मान और मानवीय मूल्यों को बचाकर जी सकता है?


इन प्रश्नों के उत्तर उपन्यास पाठक पर थोपता नहीं। बल्कि कथा के माध्यम से उसे स्वयं उत्तर खोजने के लिए प्रेरित करता है।


लेखिका — डॉ. नीरू मोहन


डॉ. नीरू मोहन साहित्य को केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि जीवन और समाज को समझने का माध्यम मानती हैं।


उनकी लेखनी में मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, रिश्तों की जटिलता, नारी जीवन के संघर्ष और जीवन के अनदेखे पक्षों को अभिव्यक्ति देने की विशेष प्रवृत्ति दिखाई देती है।


वे उन विषयों को अपनी रचनात्मक दृष्टि का केंद्र बनाती हैं जिन पर समाज अक्सर बात करने से बचता है।


उनकी लेखनी का उद्देश्य केवल पाठक का मनोरंजन करना नहीं, बल्कि उसे सोचने, महसूस करने और अपने आसपास के संबंधों को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित करना है।


उनके लिए साहित्य वह है जो पाठक के मन में उतर जाए और पुस्तक बंद करने के बाद भी उसके भीतर प्रश्न जीवित रखे।


‘निरुपमा’ इसी साहित्यिक दृष्टि की परिणति है।


यह कृति वास्तविक जीवन के अनुभवों, वास्तविक पात्रों और सच्ची घटनाओं के माध्यम से नारी जीवन, पारिवारिक संबंधों, बीमारी, संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं को सामने लाती है।


‘निरुपमा’ मेरे लिए केवल एक उपन्यास नहीं है। यह उन जीवन-संघर्षों की अभिव्यक्ति है जिन्हें मैंने महसूस किया, देखा और शब्दों में ढालने का प्रयास किया।


यह उन स्त्रियों की आवाज़ है जो अपने ही रिश्तों के बीच अकेली पड़ जाती हैं।


यह उन लोगों की पीड़ा है जो गंभीर बीमारी से लड़ते हुए अपने आसपास के रिश्तों की वास्तविकता से भी सामना करते हैं।


यह उन रिश्तों का आईना है जिन पर हम आँख मूँदकर विश्वास करते हैं।


और यह उस जीवन की कहानी है जो बाहर से सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर अनेक संघर्षों को समेटे होता है।


मेरा विश्वास है कि किसी रचना का सबसे बड़ा सम्मान तब होता है जब वह पाठक के हृदय को स्पर्श करे, उसे अपनी जिंदगी का कोई पन्ना दिखाई दे और उसे समाज के बारे में सोचने के लिए विवश करे।


‘निरुपमा’ इसी विश्वास की साहित्यिक अभिव्यक्ति है।


डॉ. नीरू मोहन 

परिचय


1. नाम


डॉ. नीरू मोहन


2. जन्म


जन्म तिथि: 1 अगस्त 1973


3. शैक्षणिक योग्यता


स्नातक: राजनीति विज्ञान — दौलतराम कॉलेज


स्नातकोत्तर: हिंदी एवं राजनीति विज्ञान


बी.एड.: हिंदी एवं सामाजिक विज्ञान


एम.फिल.: हिंदी साहित्य — शोधकार्य ‘आदिकाल और रीतिकाल’


पी-एच.डी.: हिंदी — अटल  बिहारी वाजपेयी : ‘जीवन-सृजन एवं मूल्यांकन’


अन्य योग्यता: एन.टी.टी., पी.टी.टी. तथा एडवांस टेक्निकल कोर्स इन ड्रेस डिजाइनिंग एंड ट्रेड


4. कार्यक्षेत्र


भाषाविद्


शिक्षिका


प्रेरक वक्ता


साहित्य लेखन


बाल विकास


नारी उत्थान


हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार एवं उत्थान के लिए समर्पित


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5. साहित्यिक सक्रियता


पिछले 20 वर्षों से हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में निरंतर लेखन।


लेख एवं आलेख


लघुकथा


संस्मरण


छंदयुक्त एवं छंदमुक्त कविता


दोहा


सायली छंद


उद्धरण/अवतरण


सुविचार


कुंडलियाँ


नाटक एवं नुक्कड़ नाटक


भाषण


कहानी


बाल-कविता एवं बाल-कहानियाँ


साहित्यिक समीक्षा


निबंध


शोधकार्य


उपन्यास


जापानी काव्य शैलियाँ—हाइकु, चोका, तांका, रेंगा आदि


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6. प्रमुख मौलिक पुस्तकें


① पद्मंजलि


नारी के मनोभावों का सजीव चित्रण प्रस्तुत करने वाली कृति।


इसमें स्त्री-मन, उसकी संवेदनाओं और जीवन-संघर्षों को साहित्यिक अभिव्यक्ति दी गई है।


② ‘नव प्रवर्तन’


बाल-काव्य संग्रह।


बालमन, बाल-संवेदना और रचनात्मक चेतना से जुड़ी कविताओं का संग्रह।


③ ‘बूँद-बूँद सागर’


हाइकु मुक्तक/काव्य संग्रह।


जापानी काव्य शैली हाइकु को केंद्र में रखते हुए रचित कृति।


अगस्त 2018 में हुए इंडो नेपाल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में इस पुस्तक का विमोचन हुआ।


④ ‘क्षितिज… एक अंतहीन सफर’


सत्य घटनाओं पर आधारित 25 कहानियों का संग्रह।


जीवन के यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं को केंद्र में रखती हुई कृति।


इसका ई-बुक संस्करण अमेज़न एवं किंडल पर उपलब्ध है।


इसका अंग्रेजी रूपांतरण ‘HORIZON… An endless journey’ के रूप में प्रकाशित है।


अंग्रेजी संस्करण का ई-बुक एवं पेपरबैक संस्करण भी उपलब्ध है।


⑤ ‘व्याकरण रस’


प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए उपयोगी पुस्तक।


इसमें 150 महत्वपूर्ण प्रश्नों का संग्रह है।


अमेज़न एवं किंडल पर उपलब्ध।


⑥ ‘मीठी-मीठी किलकारियाँ’


बाल-काव्य संग्रह।


बच्चों की सहज दुनिया, कल्पना और संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने वाली रचनाएँ।


* अटलगाथा  (हंस प्रकाशन अमेजॉन पर उपलब्ध)


* निरुपमा : संघर्षों के सैलाब पर स्त्री जीवन (उपन्यास, my book publication Amazon)


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7. काव्य एवं अन्य साहित्यिक योगदान


जापानी काव्य शैलियों में निरंतर सृजन।


हाइकु, चोका, तांका और रेंगा जैसी विधाओं में लेखन।


देश-विदेश के विभिन्न साहित्यिक मंचों पर रचनाओं की प्रस्तुति।


साहित्य के साथ-साथ भाषा, बाल-साहित्य और नारी विमर्श को विशेष महत्व।


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8. प्रमुख साहित्यिक सम्मान


डॉ. नीरू मोहन को साहित्य एवं सामाजिक सरोकारों के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं—


भाव भूषण सम्मान — साहित्य संगम संस्थान


वीणापाणि  सम्मान — साहित्य संगम संस्थान


काव्य रंगोली मातृभाषा गौरव सम्मान


सुपर एचीवर्स अवॉर्ड — 2018


नारी शक्ति गौरव अवॉर्ड — 2018


क्राउन ऑफ सक्सेस वूमेन सेलिब्रिटीज — 2018


विलक्षण समाज सारथी सम्मान — 2018


मंथन संस्थान द्वारा नारी गौरव सम्मान — 2018


भारत उत्थान न्यास, कानपुर एवं महिला स्नातकोत्तर विश्वविद्यालय, गाज़ीपुर द्वारा अतिथि वक्ता के रूप में आमंत्रित


वूमेन पॉवर सोसायटी द्वारा विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित एवं सम्मानित


वूमेन फाउंडेशन एवं भागीदारी जन समिति की ओर से नारी गौरव सम्मान एवं स्वर्ण पदक से सम्मानित


अनेक संस्थाओं द्वारा उत्कृष्ट साहित्य लेखन एवं सामाजिक समर्पण के लिए सम्मानित


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9. साहित्यिक एवं सामाजिक भूमिका


विभिन्न विद्यालयों, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं द्वारा निर्णायक के रूप में आमंत्रित।


अनेक कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में सहभागिता।


साहित्य और समाज के बीच सेतु का कार्य।


हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार एवं संवर्धन के लिए निरंतर सक्रिय।


नारी सशक्तीकरण और बाल विकास के क्षेत्र में विशेष रुचि।


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10. डॉ. नीरू मोहन की साहित्यिक पहचान


डॉ. नीरू मोहन की पहचान केवल एक लेखिका के रूप में नहीं, बल्कि एक शिक्षिका, साहित्यकार, शोधकर्ता, कवयित्री, कथाकार, समीक्षक और संवेदनशील सामाजिक चिंतक के रूप में है।


उनकी लेखनी की विशेषता है—


सरल भाषा में गहरी बात कहना


नारी मन की संवेदनाओं को स्वर देना


सामाजिक विसंगतियों पर प्रश्न उठाना


बालमन को समझना


जीवन के यथार्थ को साहित्य में उतारना


परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करना


साहित्य को समाजोपयोगी बनाना


एक पंक्ति में परिचय


> “डॉ. नीरू मोहन वह साहित्यिक व्यक्तित्व हैं, जिनकी लेखनी में संवेदना की गहराई, विचारों की प्रखरता, नारी मन की पीड़ा, बालमन की सरलता और समाज के यथार्थ की स्पष्ट अभिव्यक्ति एक साथ दिखाई देती है।”


डॉ. नीरू मोहन — साहित्य की संवेदनशील लेखनी, शिक्षा की सजग दृष्टि और समाज के प्रति समर्पित व्यक्तित्व।

Monday, 3 August 2026

बरसात का लोकतंत्र

 बरसात का लोकतंत्र


जब बादल कम और बहाने ज़्यादा बरसे...


रात भर बादल गरजते रहे।


सुबह अख़बार आया तो पहली खबर थी—


"शहर पानी-पानी!"


दूसरी खबर थी—


"प्रशासन पूरी तरह सतर्क।"


दोनों खबरें साथ पढ़कर रामस्वरूप हँस पड़ा।


बोला, "अगर प्रशासन सचमुच सतर्क होता तो शहर पानी-पानी नहीं होता, और अगर शहर पानी-पानी है तो सतर्कता प्रेस नोट में ही रही होगी।"


बात आई-गई हो गई।


लेकिन दो घंटे बाद उसकी गली सचमुच नदी बन चुकी थी।


बच्चे स्कूल नहीं जा पाए।


एम्बुलेंस आधे रास्ते में फँस गई।


दूध वाला नाव खोज रहा था और नगर निगम के अधिकारी फ़ाइल।


उधर जिला कार्यालय में आपात बैठक चल रही थी।


पहला अधिकारी बोला,

"स्थिति गंभीर है।"


दूसरा बोला,

"जी, मीडिया को पहले बता दें कि हम रात से मैदान में हैं।"


तीसरा बोला,

"सर... मैदान तो पानी में है।"


सबने उसे घूरकर देखा।

इतनी ईमानदारी सरकारी बैठक में अच्छी नहीं लगती।


इधर नेता जी का काफ़िला निकल पड़ा।


चार गाड़ियाँ...


आठ सुरक्षाकर्मी...


दस कैमरे...


और एक जोड़ी बिल्कुल नई रबर की चप्पल।


नेता जी घुटने तक पानी में उतरे।


कैमरामैन चिल्लाया—

"सर... थोड़ा उदास चेहरा बनाइए।"


चेहरा उदास हुआ।


दूसरे कैमरे ने कहा—

"सर... अब एक बच्चे को गोद में ले लीजिए।"


बच्चा आया।


फोटो हुई।


बच्चा वापस चला गया।


नेता जी ने चप्पल उतारी और गाड़ी में बैठते हुए बोले—


"जनता के दुख-दर्द में हमेशा साथ हूँ।"


पीछे खड़ा बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा था—


"माँ... ये अंकल हमारे साथ कब थे?"


माँ ने कहा—


"बेटा... फोटो में।"


उधर सोशल मीडिया पर भी बाढ़ आ चुकी थी।


एक युवक कमर तक पानी में खड़ा होकर रील बना रहा था—


"हेलो दोस्तों...

देखिए मैं मौत के मुँह से लाइव हूँ।

वीडियो अच्छा लगे तो लाइक, शेयर और सब्सक्राइब ज़रूर करना।"


पाँच मिनट बाद वही युवक पानी से निकलकर कॉफी पीते हुए अगली रील बना रहा था—


"बारिश का मज़ा ही कुछ और है..."


दूसरी ओर एक बुज़ुर्ग अपनी दवाइयाँ बचाने के लिए पानी में घुटनों के बल रेंग रहे थे।


लेकिन उनकी कोई रील नहीं बनी।


क्योंकि दर्द कभी ट्रेंड नहीं करता...


ड्रामा करता है।


शाम तक प्रशासन ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर दी।


कहा—


"इतनी बारिश सौ साल में पहली बार हुई है।"


पास बैठा बूढ़ा शिक्षक मुस्कुराया।


बोला—


"बेटा...

बारिश तो हर साल नई होती है,

लेकिन बहाना हमेशा पुराना होता है।"


अगले दिन विपक्ष पहुँचा।


उन्होंने उसी सड़क पर प्रेस वार्ता की जहाँ कल सत्ता पक्ष खड़ा था।


बोले—


"यदि हम सत्ता में होते तो शहर वेनिस बन जाता।"


भीड़ में से आवाज़ आई—


"साहब...

शहर तो अभी भी वेनिस ही बना हुआ है।

बस फ़र्क इतना है कि वहाँ गोंडोला चलता है, यहाँ ट्रैक्टर।"


तालियाँ बज उठीं।


दोनों पक्ष मुस्कुराए।


क्योंकि जनता की हँसी भी चुनाव तक ही गिनी जाती है।


उधर ठेकेदार अपने बंगले की बालकनी से बारिश देख रहा था।


उसने चाय की चुस्की ली और इंजीनियर से कहा—


"सड़क फिर बह गई?"


इंजीनियर बोला—


"जी सर।"


ठेकेदार मुस्कुराया—


"बहुत बढ़िया।

अगले महीने फिर टेंडर आएगा।"


बारिश उसकी दुश्मन नहीं थी...


उसकी साझेदार थी।


रात को टीवी चैनलों पर बहस शुरू हो गई।


एक एंकर गरजा—


"देश जानना चाहता है कि पानी सड़क पर क्यों है?"


दूसरा गरजा—


"पहले यह बताइए कि विपक्ष कहाँ था?"


तीसरा गरजा—


"इसमें विदेशी साज़िश की भी जाँच होनी चाहिए।"


इतनी देर में शहर का एक बच्चा अपनी कॉपी में नाव बना रहा था।


उसने मासूमियत से पूछा—


"पापा...

क्या बारिश हमेशा सड़कें बहा देती है?"


पिता ने लंबी साँस ली और कहा—


"नहीं बेटा...

बारिश तो सिर्फ़ पानी लाती है।


सड़कें तो बेईमानी बहा देती है।"


बच्चे ने फिर पूछा—


"फिर हर साल यही क्यों होता है?"


पिता ने कहा—


"क्योंकि हर साल बादल बदलते हैं...

लेकिन नीयत नहीं।"


अगली सुबह सूरज निकल आया।


पानी उतर गया।


कीचड़ रह गया।


वादे रह गए।


फ़ोटो रह गए।


हैशटैग बदल गए।


और शहर अगले मानसून का इंतज़ार करने लगा।


क्योंकि यहाँ बरसात मौसम नहीं...


एक वार्षिक उत्सव है—


जहाँ जनता डूबती है...


राजनीति तैरती है...


प्रशासन प्रेस नोट लिखता है...


ठेकेदार अगला टेंडर गिनता है...


और सोशल मीडिया पूछता है—


"दोस्तों... आपको बारिश कैसी लगी? कमेंट करके ज़रूर बताइए!"


याद रखिए—


बरसात कभी शहर को नहीं डुबोती।


शहर तब डूबता है जब नालियों से पहले ज़मीर जाम हो जाए, जब जिम्मेदारी फ़ाइलों में बह जाए और जब जनता हर साल भीगने की आदत को ही अपनी किस्मत मान ले।


जिस दिन नागरिक सवाल पूछना सीख जाएगा और व्यवस्था जवाब देना, उस दिन बारिश केवल मौसम होगी—समाचार नहीं।

बरसात : जब बादल नहीं, चरित्र टपकने लगे

 बरसात : जब बादल नहीं, चरित्र टपकने लगे


पहली बारिश की बूँद जैसे ही धरती पर गिरी, मिट्टी महक उठी। बच्चे कागज़ की नाव लेकर दौड़ पड़े। किसान ने आकाश की ओर हाथ जोड़ दिए। मोर ने पंख फैला दिए।


लेकिन शहर में एक अलग ही बरसात शुरू हो चुकी थी।


यह पानी की नहीं, अवसरों की बरसात थी।


नगर निगम की सड़कें पहली फुहार में ही ऐसे बह गईं, मानो डामर ने भी ठेकेदार से कह दिया हो—"भाई, जितना कमीशन मिला था, उतना ही टिक पाया।"


नेता जी छाता लेकर निकले। कैमरे पहले से तैयार थे। एक बच्चे को गोद में उठाया, दो मिनट कीचड़ में चले, तीसरे मिनट गाड़ी में बैठकर बोले—

"देखिए, जनता के बीच हूँ।"


उधर सोशल मीडिया पर भी बादल गरज रहे थे।


किसी ने दस साल पुरानी बाढ़ की तस्वीर डालकर लिखा—"आज हमारे शहर का हाल।"


दूसरे ने किसी विदेशी सड़क की फोटो लगाकर लिखा—"यह हमारे वार्ड की उपलब्धि है।"


तीसरे ने घर की खिड़की से चाय का कप पकड़कर लिखा—

"बारिश... अहा! कितना सुंदर मौसम!"


उसी पोस्ट के नीचे एक रिक्शेवाला भीगते हुए सवारी ढूँढ़ रहा था।

एक मजदूर की आधी दिहाड़ी बारिश बहा ले गई थी।

एक फुटपाथ पर रहने वाली माँ अपने बच्चों को प्लास्टिक से ढँक रही थी।


पर उनकी तस्वीरें ट्रेंड नहीं करतीं।


बारिश तेज हुई तो मोहल्ले के नाले ने लोकतंत्र की तरह अपना मुँह खोल दिया।

जिसने कभी सफाई नहीं देखी थी, वह अब पूरे अधिकार से सड़क पर बह रहा था।


लोग बोले—

"सरकार निकम्मी है।"


सरकार बोली—

"पिछली सरकार जिम्मेदार है।"


पिछली सरकार बोली—

"हमारे समय में इतनी बारिश कहाँ होती थी!"


और बादल ऊपर से हँस रहे थे।


इतने में चौराहे पर बैठे एक बूढ़े चायवाले ने मुस्कुराकर कहा—


"बेटा, बरसात तो हर साल आती है। फर्क इतना है कि पहले छत टपकती थी, अब नीयत टपकती है।"


सभी चुप हो गए।


वह फिर बोला—


"पहले लोग बरसात में पड़ोसी को घर बुला लेते थे।

अब मोबाइल निकालकर उसकी डूबती हुई वीडियो बना लेते हैं।

पहले छाता बाँटा जाता था।

अब सलाह बाँटी जाती है।

पहले नालियाँ साफ होती थीं।

अब सिर्फ भाषण साफ-सुथरे होते हैं।"


बारिश धीरे-धीरे थम गई।


सड़क पर कीचड़ रह गया।

दीवारों पर पोस्टर रह गए।

सोशल मीडिया पर रीलें रह गईं।


और लोगों के मन में वही पुराना सवाल रह गया—


"बरसात आखिर पानी की थी... या इंसानियत के बह जाने की?"


उस दिन समझ आया कि बादल कभी समाज को डुबोते नहीं।


समाज तब डूबता है जब ईमानदारी सूख जाती है, जिम्मेदारियाँ बह जाती हैं और संवेदनाएँ सीवर में उतर जाती हैं।


बरसात से डरना नहीं चाहिए...

डर उस दिन से होना चाहिए, जिस दिन पानी से पहले हमारा चरित्र बहने लगे।

Saturday, 1 August 2026

आत्मीय आभार

 आत्मीय आभार


जीवन की एक और सीढ़ी पर

समय ने चुपचाप मेरा हाथ थाम लिया है।

पीछे मुड़कर देखती हूँ तो

यात्रा में जितनी उपलब्धियाँ दिखती हैं,

उनसे कहीं अधिक

आप सभी लोगों का स्नेह दिखाई देता है।


🎉 जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🎉


जन्मदिन की असली खुशी

दो आत्मीय शब्दों में परिपूर्ण है।


यह उन संबंधों में भी बसती है

जो बिना किसी आग्रह के

आपको अपनी शुभकामनाओं में याद रखते हैं।


आज जो भी शुभेच्छाएँ मिलीं,

वे केवल शब्द नहीं थीं—

वे विश्वास थीं, अपनापन था,

और वह मौन आशीर्वाद था

जो दूर रहकर भी

सीधे हृदय तक पहुँच जाता है।


मैं अपने विद्यालय के आदरणीय प्रबंधक महोदय जी,

आदरणीया प्रधानाचार्य जी,

आदरणीय उपप्रधानाचार्य जी

तथा अपने सभी प्रिय साथी शिक्षकों के प्रति

हृदय की गहराइयों से कृतज्ञ हूँ।


आप सबका स्नेह, सम्मान और आशीर्वाद

मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं।

विश्वास मानिए,

आपकी शुभकामनाएँ मुझ तक पहुँच चुकी हैं—

उन्होंने आज के दिन को

उत्सव नहीं, आशीर्वाद बना दिया है।


इस जन्मदिन पर मैं ईश्वर से अपने लिए नहीं,

आप सभी के स्वस्थ, सुखी और उज्ज्वल जीवन की

कामना करती हूँ। यदि मेरे हिस्से का कोई भी प्रकाश है,

तो वह आप सबके स्नेह से ही प्रकाशित है।


स्नेह सहित

सदैव समर्पित

डॉ. नीरू मोहन

जन्मदिन का सबसे बड़ा उपहार

 जन्मदिन का सबसे बड़ा उपहार

आज सुबह जैसे ही आँख खुली, मोबाइल पर शुभकामनाओं की घंटियाँ बजने लगीं।

किसी ने लिखा— "ईश्वर आपको स्वस्थ रखें।"

किसी ने लिखा— "आपकी लेखनी यूँ ही समाज को दिशा देती रहे।"

किसी ने केवल एक 🌹 भेजा, पर उस गुलाब में भी अपनापन था।

मैं हर संदेश पढ़ती गई... और मन कृतज्ञता से भरता गया।

फिर न जाने क्यों, उँगली मोबाइल की उस सूची तक पहुँच गई जहाँ मेरे अपने... मेरे खून के रिश्ते थे।

मैंने सोचा— "शायद अभी तक व्यस्त होंगे... अभी संदेश आएगा..."

सुबह दोपहर बनी... दोपहर शाम में बदल गई...

लेकिन कुछ मोबाइल नंबर आज भी वैसे ही मौन थे, जैसे वर्षों से उनके मन मौन हैं।

तब अचानक लगा...

रिश्ते खून से नहीं टूटते, वे उपेक्षा से टूटते हैं।

कई लोग कहते हैं— "खून कभी पानी नहीं होता।"

पर मैंने जीवन में देखा है कि कई बार खून इतना ठंडा हो जाता है कि उसमें संवेदना ही जम जाती है।

आज के समय में सबसे अधिक ईर्ष्या कोई अजनबी नहीं करता।

सबसे अधिक बेचैनी उसे होती है... जो आपका अपना कहलाता है।

उसे आपका संघर्ष नहीं दिखाई देता।

उसे केवल आपकी सफलता दिखाई देती है।

उसे आपकी जागी हुई रातें नहीं दिखतीं।

उसे केवल आपकी मुस्कान दिखाई देती है।

और वही मुस्कान उसके भीतर ईर्ष्या की आग बन जाती है।

मैंने ऐसे रिश्ते देखे हैं...

जो हर पारिवारिक समारोह में सबसे आगे बैठते हैं, पर जब परिवार का कोई सदस्य संकट में हो, तो सबसे पहले अपनी नज़रें फेर लेते हैं।

वे आपके घर की मिठाई खा सकते हैं, लेकिन आपकी खुशी पचा नहीं सकते।

वे आपके दुख पर आँसू नहीं बहाते, लेकिन आपकी उपलब्धियों पर रातभर करवटें बदलते हैं।

सबसे बड़ा आश्चर्य यह नहीं कि वे साथ नहीं आए...

सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि उन्हें कभी अपनी कमी महसूस भी नहीं हुई।

आज जन्मदिन पर मुझे एक सत्य और स्पष्ट दिखाई दिया—

खानदान बहुत बड़ा हो सकता है, लेकिन इंसान बहुत कम होते हैं।

रिश्तेदारों की भीड़ में कई बार एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिलता, जो केवल इतना कह दे—

"घबराना मत... मैं तुम्हारे साथ हूँ।"

विश्वास कीजिए...

यह एक वाक्य किसी लाखों के उपहार से बड़ा होता है।

मैंने यह भी सीखा है कि जो लोग आपकी अनुपस्थिति में आपकी बुराई सुनकर मुस्कुरा देते हैं, वे आपकी उपस्थिति में चाहे जितनी बड़ी मुस्कान दे दें, उनकी आत्मा का आईना साफ़ नहीं होता।

इसलिए अब शिकायत नहीं करती।

क्योंकि जीवन ने सिखा दिया है—

रिश्ते जन्म से मिलते हैं, लेकिन अपने कर्मों से कमाने पड़ते हैं।

आज मेरे जन्मदिन पर मैं किसी से कोई गिला नहीं रखती।

मैं केवल इतना चाहती हूँ कि कोई भी मनुष्य अपने ही लोगों के बीच अकेला न पड़े।

यदि आपके घर, परिवार या रिश्तेदारी में कोई ऐसा व्यक्ति है जो चुपचाप संघर्ष कर रहा है...

तो उसे धन मत दीजिए।

उसे केवल दो शब्द दीजिए—

"मैं तुम्हारे साथ हूँ।"

क्योंकि कई बार यही दो शब्द किसी टूटते हुए मनुष्य को फिर से जीना सिखा देते हैं।

और अंत में...

आज मुझे सबसे बड़ा उपहार उन लोगों से मिला, जिनसे मेरा खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन हृदय का संबंध था।

तब समझ आया—

रक्त शरीर को जीवित रखता है,

पर प्रेम ही रिश्तों को जीवित रखता है।

खून का रिश्ता जन्म देता है,

लेकिन आत्मीयता ही जीवन भर साथ निभाती है।

– डॉ. नीरू मोहन

"पति गुस्सा करे तो क्या करें?" संवाद शैली

 "पति गुस्सा करे तो क्या करें?"

पत्नी: आजकल लोग पूछते हैं—पति गुस्सा करे तो क्या करें?

परामर्शदाता: सबसे पहले यह समझिए कि हर गुस्से का जवाब गुस्से से देना समाधान नहीं होता।

पत्नी: तो क्या हमेशा चुप रहना चाहिए?

परामर्शदाता: नहीं। चुप्पी भी हमेशा समाधान नहीं होती। यदि सामने वाला बहुत क्रोधित है, तो पहले उसे शांत होने का समय दें। फिर सही समय पर शांत स्वर में बात करें।

पत्नी: अगर गुस्सा मेरी गलती की वजह से हो?

परामर्शदाता: अपनी गलती स्वीकार करना रिश्ते को छोटा नहीं, बल्कि मजबूत बनाता है।

पत्नी: और अगर गलती उनकी हो?

परामर्शदाता: तब भी अपमान या ताने देने के बजाय अपनी बात स्पष्ट और सम्मानपूर्वक रखें। उद्देश्य जीतना नहीं, रिश्ता बचाना होना चाहिए।

पत्नी: अगर उनका गुस्सा बार-बार अपमान, डराने या मारपीट तक पहुँच जाए?

परामर्शदाता: यह सामान्य वैवाहिक मतभेद नहीं है। ऐसी स्थिति में अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता दें, भरोसेमंद परिवारजन या मित्र से बात करें और आवश्यकता हो तो पेशेवर या कानूनी सहायता लें।

पत्नी: तो रिश्ते का सबसे बड़ा मंत्र क्या है?

परामर्शदाता: गुस्से में निर्णय नहीं, और शांति में संवाद। सम्मान, धैर्य और विश्वास—यही किसी भी विवाह की सबसे मजबूत नींव हैं।

समापन संदेश:

"पति हो या पत्नी—गुस्सा इंसान को छोटा नहीं बनाता, लेकिन गुस्से में बोले गए शब्द अक्सर रिश्तों को छोटा कर देते हैं। इसलिए बहस जीतने से अधिक महत्वपूर्ण है, रिश्ता बचाना।"

पति गुस्सा करे तो क्या करें? एकल संवाद

 पति गुस्सा करे तो क्या करें?


अक्सर मुझसे पूछा जाता है—"मैडम, पति बहुत गुस्सा करते हैं, क्या करें?"


तो मेरा पहला जवाब होता है—सबसे पहले यह समझिए कि गुस्सा कोई बीमारी नहीं, एक भावना है। लेकिन उस भावना को कैसे व्यक्त किया जाए, यही इंसान का चरित्र बताता है।


पति गुस्सा करें तो उसी समय बहस जीतने की कोशिश मत कीजिए। आग पर पेट्रोल डालने से घर नहीं बचता। कभी-कभी एक कदम पीछे हटना हार नहीं, रिश्ते की समझदारी होती है।


लेकिन इसका यह अर्थ भी बिल्कुल नहीं कि हर बार चुप रहिए, हर अपमान सहिए या अपनी आत्मसम्मान की बलि दे दीजिए। शांत समय का इंतज़ार कीजिए और फिर स्पष्ट शब्दों में कहिए—"आपकी बात मुझे स्वीकार हो सकती है, लेकिन आपका गुस्सा और अपमान नहीं।"


याद रखिए, पति-पत्नी का रिश्ता अदालत नहीं है, जहाँ हर दिन कोई जीते और कोई हारे। यह तो वह जगह है जहाँ दोनों को मिलकर रिश्ता जीतना होता है।


हाँ, एक बात और। यदि गुस्सा केवल ऊँची आवाज़ तक सीमित नहीं है, बल्कि गाली, अपमान, धमकी या हाथ उठाने तक पहुँच गया है, तो इसे सामान्य मत मानिए। वहाँ चुप्पी नहीं, साहस और सही मदद की ज़रूरत होती है।


इसलिए मेरा मानना है—पति गुस्सा करें तो पहले परिस्थिति को संभालिए, फिर संवाद कीजिए। लेकिन यदि गुस्सा आपकी गरिमा और सुरक्षा पर चोट करने लगे, तो समझौता नहीं, सही निर्णय लीजिए।


क्योंकि रिश्ते प्यार से चलते हैं, डर से नहीं।

जब मैं मरकर वापस आई

 जब मैं मरकर वापस आई


जिस दिन मैं मरी, उस दिन पहली बार मेरे घर में इतनी भीड़ थी।


जिन रिश्तेदारों को मेरे जीते-जी मेरा पता याद नहीं था, वे सबसे आगे खड़े होकर रो रहे थे। पड़ोसन, जो हर सुबह मेरी बुराई से अपनी चाय मीठी करती थी, आज कह रही थी—

"बहुत नेक औरत थी... भगवान ऐसी आत्मा सबको दे।"


मैं ऊपर खड़ी सब देख रही थी।


यमदूत बोले, "चलो, समय हो गया।"


मैंने कहा, "बस पाँच मिनट... देख लूँ, मेरे जाने के बाद कौन कितना दुखी है।"


उन्होंने मुस्कुराकर इजाज़त दे दी।


सबसे पहले मेरी अलमारी खुली।


आँसू पोंछते-पोंछते लोग गहनों का हिसाब लगाने लगे।

बेटा बोला, "माँ ने किसे क्या लिखा है?"

बेटी बोली, "पहले लॉकर की चाबी ढूँढ़ो।"


पति, जो जीते-जी कभी चाय तक नहीं बना पाए थे, अब रिश्तेदारों के सामने सुबकते हुए कह रहे थे—

"मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी चली गई..."


और पाँच मिनट बाद वही धीरे से पूछ रहे थे—

"खाना कितने लोगों का बनवाना है?"


मैंने पहली बार समझा...

मौत से बड़ा आयोजन, मौत के बाद की व्यवस्थाएँ होती हैं।


तभी मोबाइल बजने लगे।


एक ने मेरी फोटो पर काली पट्टी लगाई।

दूसरे ने लिखा—

"ओम् शांति... जीवन का कोई भरोसा नहीं।"


तीसरे ने पोस्ट डालते ही नीचे लिखा—

"वैसे मेरी नई रील भी देख लेना।"


मैं हँसी भी और रोई भी।


तभी यमराज बोले,

"चलो, अब सच जान लिया?"


मैंने कहा,

"नहीं प्रभु... एक कमरा अभी बाकी है।"


वहाँ मेरी बूढ़ी माँ अकेली बैठी थीं।


उनके पास न मोबाइल था,

न श्रद्धांजलि का भाषण,

न कैमरा।


बस मेरी बचपन की फ्रॉक सीने से लगाकर इतना ही कह रही थीं—


"बेटी... एक बार आ जा।"


उस एक वाक्य ने मेरी पूरी आत्मा हिला दी।


शायद पहली बार समझ आया कि दुनिया में सबसे सच्चा शोक वही करता है,

जिसने आपको सचमुच जिया हो।


इतने में ऊपर से आवाज़ आई—


"गलती हो गई...

जिसे लाना था, वह दूसरी गली में रहती थी।

तुम्हारी उम्र अभी बाकी है।"


और अगले ही पल...


मैं अस्पताल के बिस्तर पर आँखें खोल चुकी थी।


सब मुझे देखकर खुश थे।


लेकिन मैं बदल चुकी थी।


अब मैंने लोगों की बातों पर नहीं,

उनके व्यवहार पर विश्वास करना शुरू किया।


अब मैं हर दिन ऐसे जीती हूँ,

मानो मौत अभी दरवाज़े पर खड़ी हो।


क्योंकि...


मरकर वापस आने से मैंने यही सीखा—

इंसान की असली कीमत उसके मरने पर नहीं, उसके जीते-जी दिए गए सम्मान से तय होती है।

मेरे से मिलने आए कान्हा

 मेरे से मिलने आए कान्हा


उस रात मैं बिल्कुल अकेला था।


कमरे में सन्नाटा था, लेकिन मेरे भीतर शोर था।

रिश्तों के टूटने का शोर...

उम्मीदों के बिखरने का शोर...

और उन चेहरों का शोर, जिन्हें मैंने अपना समझा था।


कहते हैं कि अपने कभी धोखा नहीं देते।


लेकिन जीवन ने सिखाया कि कभी-कभी सबसे गहरे घाव वही देते हैं, जिनके लिए हम सबसे अधिक जीते हैं।


मैं सोचता रहा—

क्या रिश्ते केवल स्वार्थ तक ही सीमित रह गए हैं?

क्या बड़े-बुज़ुर्गों के सम्मान की कीमत अब सुविधाओं से तय होती है?

क्या त्याग का कोई मोल नहीं बचा?


इन सवालों का उत्तर किसी इंसान के पास नहीं था।


मैंने थके हुए मन से श्रीकृष्ण की तस्वीर के सामने दीपक जलाया।


बस इतना ही कहा—


"कान्हा... अब मुझसे नहीं होता।

अगर सच में हो, तो एक बार मिल जाओ।"


आँखें कब बंद हुईं, पता ही नहीं चला।


अचानक बाँसुरी की मधुर धुन सुनाई दी।


मैंने आँखें खोलीं।


सामने पीताम्बर धारण किए, मोरपंख सजाए, अधरों पर मुस्कान लिए कान्हा खड़े थे।


मैं फूट-फूटकर रो पड़ा।


मैंने कहा,

"कान्हा...

जिन्हें अपना माना, वही बदल गए।

जिनके लिए जीवन लगा दिया, उन्होंने ही मुझे अकेला छोड़ दिया।"


कान्हा मुस्कुराए।


बोले,

"तुम्हें लोगों ने नहीं बदला...

उन्होंने तुम्हारी आँखों से भ्रम हटाया है।


जिसे तुम अंत समझ रहे हो,

मैं उसे तुम्हारी नई शुरुआत बना रहा हूँ।"


मैंने पूछा,

"लेकिन इतना दर्द क्यों?"


कान्हा ने कहा,


"सोना आग में तपे बिना कुंदन नहीं बनता।

और भक्त परीक्षा के बिना भक्त नहीं बनता।"


मैं चुप था।


उन्होंने फिर कहा,


"तुम लोगों के व्यवहार को अपना भाग्य मत समझो।

जो तुम्हें छोड़ गए, उन्हें छोड़ दो।

लेकिन अपने भीतर का प्रेम मत छोड़ना।

क्योंकि जो कटु होकर जीता है, वह हर दिन हारता है।

जो विश्वास रखकर जीता है, उसे मैं कभी अकेला नहीं छोड़ता।"


इतना कहकर कान्हा ने मेरा हाथ थाम लिया।


उस स्पर्श में ऐसी शांति थी, जो वर्षों से नहीं मिली थी।


सुबह जब मेरी आँख खुली, तो कमरा वैसा ही था।


दीपक अब भी जल रहा था।


लेकिन मैं बदल चुका था।


अब मैं रिश्तों से अपेक्षा नहीं करता।

सम्मान मिले तो धन्यवाद,

न मिले तो भी शिकायत नहीं।


क्योंकि उस रात मैंने जान लिया था—


जब दुनिया के सारे दरवाज़े बंद हो जाते हैं,

तब वृंदावन का एक द्वार खुलता है।


और उस द्वार पर खड़े होकर कान्हा मुस्कुराते हुए कहते हैं—


"जब सब साथ छोड़ दें, तब समझ लेना...

अब मैं स्वयं तुम्हारा हाथ पकड़ने आया हूँ।"


उस दिन से मैंने लोगों के बदलते चेहरों को नहीं,

कान्हा की स्थिर मुस्कान को अपना सहारा बना लिया।


क्योंकि रिश्ते साथ दें या न दें,

कान्हा कभी अपने भक्त का साथ नहीं छोड़ते।

तीज का झूला और दिखावे की दुनिया"

 शीर्षक: "तीज का झूला और दिखावे की दुनिया"

सावन की पहली फुहार पड़ी तो गाँव की गलियाँ हरी चूड़ियों की खनक से भर उठीं। हर तरफ मेहंदी की खुशबू, झूलों की पींग और गीतों की मिठास थी।

गाँव की दादी बोलीं—

"तीज तो वो पर्व है बिटिया, जिसमें श्रृंगार से ज्यादा संस्कार सजते हैं।"

लेकिन अब तीज भी समय के साथ बदल गई थी।

गाँव की सीमा ने जैसे ही मोबाइल खोला, देखा—

"तीज स्पेशल प्रतियोगिता!

सबसे सुंदर साड़ी, सबसे महंगी ज्वेलरी और सबसे शानदार मेहंदी वाली महिला को मिलेगा पुरस्कार!"

सीमा मुस्कुराई और बोली—

"वाह! अब तो सुहाग की लंबी उम्र की प्रार्थना भी शायद ब्रांडेड साड़ी पहनकर ही स्वीकार होगी!"

पास बैठी उसकी सास हँस पड़ीं।

बोलीं—

"हमारे समय में तीज पर बहू के हाथों की मेहंदी देखी जाती थी, अब तो मेहंदी से ज्यादा मोबाइल कैमरे का एंगल देखा जाता है।"

उधर शहर में रहने वाली रिया ने तीज की तैयारी शुरू कर दी।

उसने पति से कहा—

"सुनो, इस बार तीज पर मुझे लाखों वाली ज्वेलरी चाहिए। पड़ोस की कविता ने पिछले साल इतनी महंगी पहनी थी कि उसकी फोटो पर हजारों लाइक आए थे।"

पति ने धीरे से पूछा—

"लेकिन तुम्हें खुशी किससे मिलेगी? गहनों से या मेरे साथ बिताए समय से?"

रिया थोड़ी देर चुप रही।

फिर बोली—

"समय तो फोटो में दिखाई नहीं देता ना!"

पति मुस्कुराया—

"शायद इसी वजह से आजकल रिश्ते कमजोर और पोस्ट मजबूत हो रहे हैं।"

तीज के दिन मोहल्ले की महिलाओं ने बड़ा आयोजन किया। मंच सजा, कैमरे लगे और घोषणा हुई—

"अब होगी मिसेज तीज प्रतियोगिता!"

एक महिला बोली—

"मेरी साड़ी विदेश से आई है।"

दूसरी बोली—

"मेरी ज्वेलरी असली है।"

तीसरी बोली—

"मेरे मेकअप आर्टिस्ट ने मुझे तीन घंटे में तैयार किया है।"

तभी कोने में बैठी बूढ़ी अम्मा ने अपनी पुरानी हरी साड़ी ठीक करते हुए कहा—

"बेटियों, एक बात पूछूँ?"

सबने उनकी ओर देखा।

अम्मा बोलीं—

"जिस तीज में पत्नी पति की लंबी उम्र की कामना करती थी, वह कब पति की जेब की लंबाई नापने का त्योहार बन गई?"

कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

अम्मा ने आगे कहा—

"मैंने भी तीज रखी है। कभी नई साड़ी नहीं मिली, कभी महंगे गहने नहीं मिले। लेकिन मेरे पति ने जब बीमारी में मेरा हाथ पकड़ा, मेरे बच्चों ने जब मेरे माथे पर प्यार से हाथ रखा—वही मेरे लिए सबसे बड़ा श्रृंगार था।"

उनकी आँखों में चमक थी।

"याद रखना बेटियों, तीज का चाँद चेहरे की चमक नहीं, रिश्तों की रोशनी देखता है।"

अगले दिन सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल थीं।

किसी की साड़ी की चर्चा थी, किसी की ज्वेलरी की।

लेकिन सबसे ज्यादा साझा की जा रही थी अम्मा की एक तस्वीर—

पुरानी हरी साड़ी में मुस्कुराती हुई।

नीचे लिखा था—

"त्योहार कपड़ों से नहीं, भावनाओं से खूबसूरत होते हैं।

जहाँ प्रेम सच्चा हो, वहाँ साधारण साड़ी भी रानी का श्रृंगार बन जाती है।"

और शायद यही तीज का असली संदेश था—

"झूले ऊँचे हों या छोटे, रिश्तों की डोर मजबूत होनी चाहिए।

क्योंकि दिखावे के बाजार में भावनाएँ सबसे कीमती और सबसे कम बिकने वाली चीज़ हैं।"

जब बादल नहीं, चरित्र टपकने लगे

 बरसात : जब बादल नहीं, चरित्र टपकने लगे


पहली बारिश की बूँद जैसे ही धरती पर गिरी, मिट्टी महक उठी। बच्चे कागज़ की नाव लेकर दौड़ पड़े। किसान ने आकाश की ओर हाथ जोड़ दिए। मोर ने पंख फैला दिए।


लेकिन शहर में एक अलग ही बरसात शुरू हो चुकी थी।


यह पानी की नहीं, अवसरों की बरसात थी।


नगर निगम की सड़कें पहली फुहार में ही ऐसे बह गईं, मानो डामर ने भी ठेकेदार से कह दिया हो—"भाई, जितना कमीशन मिला था, उतना ही टिक पाया।"


नेता जी छाता लेकर निकले। कैमरे पहले से तैयार थे। एक बच्चे को गोद में उठाया, दो मिनट कीचड़ में चले, तीसरे मिनट गाड़ी में बैठकर बोले—

"देखिए, जनता के बीच हूँ।"


उधर सोशल मीडिया पर भी बादल गरज रहे थे।


किसी ने दस साल पुरानी बाढ़ की तस्वीर डालकर लिखा—"आज हमारे शहर का हाल।"


दूसरे ने किसी विदेशी सड़क की फोटो लगाकर लिखा—"यह हमारे वार्ड की उपलब्धि है।"


तीसरे ने घर की खिड़की से चाय का कप पकड़कर लिखा—

"बारिश... अहा! कितना सुंदर मौसम!"


उसी पोस्ट के नीचे एक रिक्शेवाला भीगते हुए सवारी ढूँढ़ रहा था।

एक मजदूर की आधी दिहाड़ी बारिश बहा ले गई थी।

एक फुटपाथ पर रहने वाली माँ अपने बच्चों को प्लास्टिक से ढँक रही थी।


पर उनकी तस्वीरें ट्रेंड नहीं करतीं।


बारिश तेज हुई तो मोहल्ले के नाले ने लोकतंत्र की तरह अपना मुँह खोल दिया।

जिसने कभी सफाई नहीं देखी थी, वह अब पूरे अधिकार से सड़क पर बह रहा था।


लोग बोले—

"सरकार निकम्मी है।"


सरकार बोली—

"पिछली सरकार जिम्मेदार है।"


पिछली सरकार बोली—

"हमारे समय में इतनी बारिश कहाँ होती थी!"


और बादल ऊपर से हँस रहे थे।


इतने में चौराहे पर बैठे एक बूढ़े चायवाले ने मुस्कुराकर कहा—


"बेटा, बरसात तो हर साल आती है। फर्क इतना है कि पहले छत टपकती थी, अब नीयत टपकती है।"


सभी चुप हो गए।


वह फिर बोला—


"पहले लोग बरसात में पड़ोसी को घर बुला लेते थे।

अब मोबाइल निकालकर उसकी डूबती हुई वीडियो बना लेते हैं।

पहले छाता बाँटा जाता था।

अब सलाह बाँटी जाती है।

पहले नालियाँ साफ होती थीं।

अब सिर्फ भाषण साफ-सुथरे होते हैं।"


बारिश धीरे-धीरे थम गई।


सड़क पर कीचड़ रह गया।

दीवारों पर पोस्टर रह गए।

सोशल मीडिया पर रीलें रह गईं।


और लोगों के मन में वही पुराना सवाल रह गया—


"बरसात आखिर पानी की थी... या इंसानियत के बह जाने की?"


उस दिन समझ आया कि बादल कभी समाज को डुबोते नहीं।


समाज तब डूबता है जब ईमानदारी सूख जाती है, जिम्मेदारियाँ बह जाती हैं और संवेदनाएँ सीवर में उतर जाती हैं।


बरसात से डरना नहीं चाहिए...

डर उस दिन से होना चाहिए, जिस दिन पानी से पहले हमारा चरित्र बहने लगे।

बरसात का लोकतंत्र

 बरसात का लोकतंत्र


जब बादल कम और बहाने ज़्यादा बरसे...


रात भर बादल गरजते रहे।


सुबह अख़बार आया तो पहली खबर थी—


"शहर पानी-पानी!"


दूसरी खबर थी—


"प्रशासन पूरी तरह सतर्क।"


दोनों खबरें साथ पढ़कर रामस्वरूप हँस पड़ा।


बोला, "अगर प्रशासन सचमुच सतर्क होता तो शहर पानी-पानी नहीं होता, और अगर शहर पानी-पानी है तो सतर्कता प्रेस नोट में ही रही होगी।"


बात आई-गई हो गई।


लेकिन दो घंटे बाद उसकी गली सचमुच नदी बन चुकी थी।


बच्चे स्कूल नहीं जा पाए।


एम्बुलेंस आधे रास्ते में फँस गई।


दूध वाला नाव खोज रहा था और नगर निगम के अधिकारी फ़ाइल।


उधर जिला कार्यालय में आपात बैठक चल रही थी।


पहला अधिकारी बोला,

"स्थिति गंभीर है।"


दूसरा बोला,

"जी, मीडिया को पहले बता दें कि हम रात से मैदान में हैं।"


तीसरा बोला,

"सर... मैदान तो पानी में है।"


सबने उसे घूरकर देखा।

इतनी ईमानदारी सरकारी बैठक में अच्छी नहीं लगती।


इधर नेता जी का काफ़िला निकल पड़ा।


चार गाड़ियाँ...


आठ सुरक्षाकर्मी...


दस कैमरे...


और एक जोड़ी बिल्कुल नई रबर की चप्पल।


नेता जी घुटने तक पानी में उतरे।


कैमरामैन चिल्लाया—

"सर... थोड़ा उदास चेहरा बनाइए।"


चेहरा उदास हुआ।


दूसरे कैमरे ने कहा—

"सर... अब एक बच्चे को गोद में ले लीजिए।"


बच्चा आया।


फोटो हुई।


बच्चा वापस चला गया।


नेता जी ने चप्पल उतारी और गाड़ी में बैठते हुए बोले—


"जनता के दुख-दर्द में हमेशा साथ हूँ।"


पीछे खड़ा बच्चा अपनी माँ से पूछ रहा था—


"माँ... ये अंकल हमारे साथ कब थे?"


माँ ने कहा—


"बेटा... फोटो में।"


उधर सोशल मीडिया पर भी बाढ़ आ चुकी थी।


एक युवक कमर तक पानी में खड़ा होकर रील बना रहा था—


"हेलो दोस्तों...

देखिए मैं मौत के मुँह से लाइव हूँ।

वीडियो अच्छा लगे तो लाइक, शेयर और सब्सक्राइब ज़रूर करना।"


पाँच मिनट बाद वही युवक पानी से निकलकर कॉफी पीते हुए अगली रील बना रहा था—


"बारिश का मज़ा ही कुछ और है..."


दूसरी ओर एक बुज़ुर्ग अपनी दवाइयाँ बचाने के लिए पानी में घुटनों के बल रेंग रहे थे।


लेकिन उनकी कोई रील नहीं बनी।


क्योंकि दर्द कभी ट्रेंड नहीं करता...


ड्रामा करता है।


शाम तक प्रशासन ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर दी।


कहा—


"इतनी बारिश सौ साल में पहली बार हुई है।"


पास बैठा बूढ़ा शिक्षक मुस्कुराया।


बोला—


"बेटा...

बारिश तो हर साल नई होती है,

लेकिन बहाना हमेशा पुराना होता है।"


अगले दिन विपक्ष पहुँचा।


उन्होंने उसी सड़क पर प्रेस वार्ता की जहाँ कल सत्ता पक्ष खड़ा था।


बोले—


"यदि हम सत्ता में होते तो शहर वेनिस बन जाता।"


भीड़ में से आवाज़ आई—


"साहब...

शहर तो अभी भी वेनिस ही बना हुआ है।

बस फ़र्क इतना है कि वहाँ गोंडोला चलता है, यहाँ ट्रैक्टर।"


तालियाँ बज उठीं।


दोनों पक्ष मुस्कुराए।


क्योंकि जनता की हँसी भी चुनाव तक ही गिनी जाती है।


उधर ठेकेदार अपने बंगले की बालकनी से बारिश देख रहा था।


उसने चाय की चुस्की ली और इंजीनियर से कहा—


"सड़क फिर बह गई?"


इंजीनियर बोला—


"जी सर।"


ठेकेदार मुस्कुराया—


"बहुत बढ़िया।

अगले महीने फिर टेंडर आएगा।"


बारिश उसकी दुश्मन नहीं थी...


उसकी साझेदार थी।


रात को टीवी चैनलों पर बहस शुरू हो गई।


एक एंकर गरजा—


"देश जानना चाहता है कि पानी सड़क पर क्यों है?"


दूसरा गरजा—


"पहले यह बताइए कि विपक्ष कहाँ था?"


तीसरा गरजा—


"इसमें विदेशी साज़िश की भी जाँच होनी चाहिए।"


इतनी देर में शहर का एक बच्चा अपनी कॉपी में नाव बना रहा था।


उसने मासूमियत से पूछा—


"पापा...

क्या बारिश हमेशा सड़कें बहा देती है?"


पिता ने लंबी साँस ली और कहा—


"नहीं बेटा...

बारिश तो सिर्फ़ पानी लाती है।


सड़कें तो बेईमानी बहा देती है।"


बच्चे ने फिर पूछा—


"फिर हर साल यही क्यों होता है?"


पिता ने कहा—


"क्योंकि हर साल बादल बदलते हैं...

लेकिन नीयत नहीं।"


अगली सुबह सूरज निकल आया।


पानी उतर गया।


कीचड़ रह गया।


वादे रह गए।


फ़ोटो रह गए।


हैशटैग बदल गए।


और शहर अगले मानसून का इंतज़ार करने लगा।


क्योंकि यहाँ बरसात मौसम नहीं...


एक वार्षिक उत्सव है—


जहाँ जनता डूबती है...


राजनीति तैरती है...


प्रशासन प्रेस नोट लिखता है...


ठेकेदार अगला टेंडर गिनता है...


और सोशल मीडिया पूछता है—


"दोस्तों... आपको बारिश कैसी लगी? कमेंट करके ज़रूर बताइए!"


याद रखिए—


बरसात कभी शहर को नहीं डुबोती।


शहर तब डूबता है जब नालियों से पहले ज़मीर जाम हो जाए, जब जिम्मेदारी फ़ाइलों में बह जाए और जब जनता हर साल भीगने की आदत को ही अपनी किस्मत मान ले।


जिस दिन नागरिक सवाल पूछना सीख जाएगा और व्यवस्था जवाब देना, उस दिन बारिश केवल मौसम होगी—समाचार नहीं।

शादी के छह पड़ाव… और सातवाँ सच"

 शीर्षक: "शादी के छह पड़ाव… और सातवाँ सच"

"शादी एक दिन का शोर नहीं होती, यह दो दिलों के बीच उम्रभर चलने वाला संवाद होती है।"

गाँव के पुराने घर की चौखट पर बैठी दादी आज फिर मुस्कुरा रही थीं। सामने आँगन में पोती की शादी की तैयारियाँ चल रही थीं। कहीं हल्दी की खुशबू थी, कहीं गीतों की गूँज और कहीं मोबाइल से फोटो खींचने की होड़।

पोती ने दादी से पूछा—

"दादी, आजकल लोग कहते हैं शादी तो बस एक इवेंट है… एक दिन की पार्टी। क्या सच में ऐसा है?"

दादी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—

"नहीं बिटिया, शादी कोई एक दिन का कार्यक्रम नहीं, यह छह पड़ावों से गुजरने वाली जिंदगी की कहानी है।"

पहला पड़ाव — रिश्ता।

दादी बोलीं—

"जब दो लोग पहली बार मिलते हैं, तब केवल चेहरे नहीं मिलते, दो संस्कार, दो परिवार और दो सपने मिलते हैं। आजकल लोग फोटो देखकर रिश्ता तय कर लेते हैं, लेकिन जिंदगी फोटो से नहीं, स्वभाव से चलती है।"

दूसरा पड़ाव — वचन।

"सगाई की अंगूठी उंगली में पहनाई जाती है, लेकिन असली वादा दिल में लिखा जाता है। अंगूठी खो जाए तो भी रिश्ता बचा रहना चाहिए।"

तीसरा पड़ाव — तैयारी।

दादी हँसते हुए बोलीं—

"आजकल शादी की तैयारी में लाखों खर्च हो जाते हैं, लेकिन कई बार एक-दूसरे को समझने के लिए पाँच मिनट भी नहीं मिलते। सजावट घर की होती है, पर रिश्ता दिल का सजना चाहिए।"

चौथा पड़ाव — विवाह।

"फेरे सिर्फ अग्नि के सामने नहीं होते बिटिया, असली फेरे तो तब होते हैं जब पति-पत्नी एक-दूसरे के दुख के चार कदम साथ चलें।"

पाँचवाँ पड़ाव — गृहस्थी।

"शादी के बाद पता चलता है कि जिंदगी केवल हनीमून की तस्वीर नहीं होती। कभी बजट की चिंता होती है, कभी जिम्मेदारियों का बोझ। वहीं से प्रेम की असली परीक्षा शुरू होती है।"

छठा पड़ाव — साथ निभाना।

दादी की आँखें नम हो गईं।

"जब बाल सफेद हो जाएँ, चेहरे पर झुर्रियाँ आ जाएँ और फिर भी दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर कहें— 'तुम साथ हो तो सब ठीक है'… वही शादी की असली जीत है।"

पोती चुपचाप दादी की बातें सुन रही थी।

तभी बाहर से आवाज आई—

"दादी, आपकी पुरानी शादी की फोटो कहाँ है?"

दादी ने दीवार की ओर देखा। वहाँ दादा जी के साथ उनकी पुरानी तस्वीर लगी थी। उन्होंने कहा—

"देखो बिटिया, उस समय न बड़े होटल थे, न महंगे कपड़े, न सोशल मीडिया पर दिखाने की चिंता। बस एक विश्वास था कि जिंदगी चाहे जैसी हो, साथ नहीं छोड़ेंगे।"

फिर दादी मुस्कुराईं और बोलीं—

"आजकल लोग शादी में मेहमानों की संख्या गिनते हैं, खर्चे का हिसाब रखते हैं… लेकिन भूल जाते हैं कि शादी की सफलता रिश्तेदारों की तालियों से नहीं, दो लोगों की खामोश समझदारी से तय होती है।"

आँगन में शहनाई बज रही थी।

पोती ने दादी का हाथ पकड़ लिया।

उसे समझ आ गया था कि—

"शादी का पहला दिन सबको दिखाई देता है, लेकिन उसे निभाने के लिए जो हजारों दिन लगते हैं, वही रिश्ते की असली कहानी लिखते हैं।"

स्वर्ग जाने की सीढ़ी

 स्वर्ग जाने की सीढ़ी


गाँव के बीचों-बीच एक दिन एक महात्मा जी आए। उन्होंने घोषणा की—


"मैं स्वर्ग जाने की सीढ़ी बेच रहा हूँ। जो इसे खरीद लेगा, उसके लिए स्वर्ग का रास्ता आसान हो जाएगा।"


बस फिर क्या था!


सुबह तक जहाँ सब्ज़ी वालों के ठेले लगते थे, वहाँ अब सीढ़ी खरीदने वालों की कतार थी।


कोई बोला, "मुझे दस पायदान वाली देना।"


दूसरा बोला, "मुझे सबसे ऊँची वाली चाहिए। आखिर मैं बड़ा आदमी हूँ।"


तीसरा बोला, "क्या ईएमआई पर मिल जाएगी? स्वर्ग भी किस्तों में मिल जाए तो अच्छा है!"


महात्मा मुस्कुराते रहे। सीढ़ियाँ बिकती रहीं।


एक नेता जी आए। बोले, "मेरे लिए वीआईपी सीढ़ी निकालो। मुझे लाइन में लगने की आदत नहीं है।"


एक व्यापारी बोला, "थोड़ी छूट कर दीजिए।"


एक बाबू ने पूछा, "कोई सिफ़ारिश वाला रास्ता नहीं है क्या?"


एक धर्मगुरु बोले, "मेरे अनुयायियों को थोक में दे दीजिए।"


महात्मा हर किसी को सीढ़ी देते रहे।


शाम होने तक पूरा मैदान सीढ़ियों से भर गया।


लेकिन एक अजीब बात हुई...


कोई ऊपर नहीं जा रहा था।


सब अपनी-अपनी सीढ़ी की सफ़ाई कर रहे थे।

कोई उसे रंग रहा था।

कोई उस पर अपना नाम लिख रहा था।

कोई उसकी फोटो सोशल मीडिया पर डाल रहा था—


"देखिए, मैंने स्वर्ग की सीढ़ी खरीद ली!"


लाइक्स बढ़ रहे थे...

लेकिन ऊँचाई नहीं।


इतने में एक बूढ़ी औरत आई।


उसने महात्मा से पूछा,

"बाबा, सीढ़ी तो सबके पास है... लेकिन स्वर्ग कौन जाएगा?"


महात्मा मुस्कुराए और बोले—


"बेटी, सीढ़ी खरीदने से कोई ऊपर नहीं जाता। ऊपर वही जाता है जो पहला कदम रखता है।"


भीड़ एक-दूसरे का चेहरा देखने लगी।


महात्मा ने आगे कहा—


"आज लोग धर्म खरीद रहे हैं, लेकिन धैर्य नहीं।

माला खरीद रहे हैं, लेकिन मन नहीं बदल रहे।

मंदिर बना रहे हैं, लेकिन भीतर का अहंकार नहीं तोड़ रहे।

दान दे रहे हैं, लेकिन अपमान बाँटना नहीं छोड़ रहे।

सीढ़ियाँ बहुत हैं...

चलने वाले बहुत कम हैं।"


इतना सुनते ही कुछ लोगों ने अपनी सीढ़ियाँ छोड़ दीं।


लेकिन अधिकांश लोग वहीं खड़े रहे...


क्योंकि उन्हें स्वर्ग नहीं,

स्वर्ग की 'सेल्फ़ी' चाहिए थी।


संदेश


आज हर व्यक्ति स्वर्ग जाने का शॉर्टकट खोज रहा है।

कोई चमत्कार में, कोई दिखावे में, कोई पद में, कोई पैसे में।


जबकि स्वर्ग की असली सीढ़ी लकड़ी या लोहे की नहीं होती।

उसकी हर पायदान पर एक शब्द लिखा होता है—


सत्य, सेवा, करुणा, क्षमा, विनम्रता, ईमानदारी और प्रेम।


जो इन पायदानों पर रोज़ चढ़ता है,

उसे स्वर्ग मरने के बाद नहीं,

जीते-जी अपने भीतर मिल जाता है।

ब्लॉगिंग की दुनिया का सच

 ब्लॉगिंग की दुनिया का सच


गाँव में एक दिन खबर फैली कि शहर से एक बड़ा "ज्ञान व्यापारी" आया है।


वह चौपाल पर खड़ा होकर चिल्ला रहा था—


"ज्ञान चाहिए? सफलता चाहिए? करोड़ों पाठक चाहिए? बस मेरा ब्लॉग पढ़िए!"


लोग उमड़ पड़े।


किसी ने पूछा, "क्या आपने जीवन में बहुत कुछ सीखा है?"


वह बोला,

"सीखा नहीं... गूगल से इकट्ठा किया है।"


दूसरे ने पूछा,

"क्या ये सब आपके अनुभव हैं?"


वह हँसा,

"अनुभव लिखने में समय लगता है, कॉपी-पेस्ट करने में नहीं।"


भीड़ फिर भी ताली बजाती रही।


कुछ ही दिनों में उसने "सफलता के 21 मंत्र", "अमीर बनने के 51 तरीके", "एक मिनट में विद्वान बनें" और "पाँच मिनट में संत बनने की कला" जैसे सैकड़ों ब्लॉग लिख डाले।


हर लेख के नीचे एक ही वाक्य लिखा होता—


"अगर यह लेख पसंद आया हो तो शेयर ज़रूर करें।"


लेकिन कहीं यह नहीं लिखा था—


"अगर जीवन बदल गया हो तो किसी ज़रूरतमंद की मदद भी कर देना।"


धीरे-धीरे गाँव के लोग भी ब्लॉग लिखने लगे।


जिसने कभी किताब नहीं पढ़ी थी, वह "पढ़ने के लाभ" पर लेख लिख रहा था।


जो सुबह दस बजे तक बिस्तर से नहीं उठता था, वह "सुबह चार बजे उठने का रहस्य" बता रहा था।


जिसका अपना परिवार उससे बात नहीं करता था, वह "रिश्ते कैसे निभाएँ" पर विशेषज्ञ बन बैठा था।


और जिसने जीवन में एक पौधा तक नहीं लगाया था, वह "पर्यावरण बचाइए" पर दस हज़ार शब्द लिख चुका था।


एक दिन गाँव के बूढ़े पुस्तकालयाध्यक्ष ने सबको बुलाया।


उन्होंने एक पुरानी डायरी दिखाई।


उसमें केवल दस पन्ने लिखे थे।


लोग हँस पड़े—

"बस इतने ही?"


बूढ़े ने शांत स्वर में कहा—


"हाँ... क्योंकि इनमें जो लिखा है, वह पहले जीया गया है, फिर लिखा गया है।"


पूरा चौपाल शांत हो गया।


उन्होंने आगे कहा—


"बेटा, ब्लॉग लिखना बुरा नहीं है।

लेकिन जब शब्द अनुभव से बड़े हो जाएँ और शीर्षक सत्य से बड़े हो जाएँ, तब लेख नहीं, भ्रम पैदा होते हैं।


आज लोग पढ़ने से ज़्यादा क्लिक गिनते हैं।

ज्ञान से ज़्यादा कीवर्ड खोजते हैं।

सत्य से ज़्यादा ट्रेंड का पीछा करते हैं।


और सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि...


जिस लेख का शीर्षक होता है — 'मोबाइल की लत छोड़िए'... उसे पढ़ने के लिए भी मोबाइल ही उठाना पड़ता है!"


चौपाल में ठहाका गूँज उठा।


लेकिन वह हँसी कुछ ही क्षणों की थी।


क्योंकि हर किसी को लगा कि यह कहानी किसी और की नहीं...


उसी की थी।


संदेश


ब्लॉगिंग का उद्देश्य केवल ट्रैफिक, विज्ञापन और वायरल होना नहीं होना चाहिए।


शब्द तब तक ज्ञान नहीं बनते, जब तक उनके पीछे सत्य, अध्ययन, अनुभव और समाज के प्रति जिम्मेदारी न हो।


जो लेखक केवल खोज-इंजन के लिए लिखता है, उसे क्लिक मिल सकते हैं।

लेकिन जो मनुष्य के अंतर्मन के लिए लिखता है, उसे इतिहास याद रखता है।

प्रदर्शन या संवाद?

 प्रदर्शन या संवाद?


शहर के चौक पर सैकड़ों विद्यार्थी इकट्ठा थे। हाथों में तख्तियाँ थीं, गुस्सा था और नारे भी।


उसी रास्ते से एक वृद्ध शिक्षक गुज़रे। उन्होंने किसी को नहीं टोका। बस पास खड़े एक छात्र से पूछा, "बेटा, क्या तुम जानते हो कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत क्या होती है?"


छात्र बोला, "प्रदर्शन।"


शिक्षक मुस्कुराए, "नहीं, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है—विवेकपूर्ण संवाद।"


सभी छात्र उनकी ओर देखने लगे।


शिक्षक बोले, "सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है। उससे सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है, लेकिन कानून का सम्मान करना भी उतना ही बड़ा कर्तव्य है। यदि विरोध हिंसा, अफवाह, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या दूसरों की पढ़ाई और जीवन में बाधा बन जाए, तो उसका उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।"


उन्होंने आगे कहा, "हर सरकार से गलती भी हो सकती है और अच्छे निर्णय भी। इसलिए न अंधा समर्थन सही है और न अंधा विरोध। सही रास्ता है—तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखना, न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना और समाज में शांति बनाए रखना।"


विद्यार्थियों में सन्नाटा छा गया।


एक छात्र आगे आया और बोला, "सर, हमने अपनी आवाज़ उठाने का अधिकार तो समझा, लेकिन अपनी ज़िम्मेदारी भूल गए थे।"


शिक्षक ने उत्तर दिया, "याद रखो, राष्ट्र केवल सरकार से नहीं बनता, बल्कि उन नागरिकों से बनता है जो मतभेद होने पर भी संविधान, कानून और एक-दूसरे के सम्मान को नहीं छोड़ते।"


उस दिन कई तख्तियाँ नीचे झुक गईं, लेकिन कई सिर ऊँचे हो गए—क्योंकि उन्होंने विरोध से पहले विवेक और संवाद का महत्व समझ लिया।


संदेश:

लोकतंत्र में अपनी बात रखना अधिकार है, परंतु कानून, शांति और संविधान का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। मतभेद हों तो समाधान संवाद और संवैधानिक तरीकों से खोजे जाने चाहिए, न कि अव्यवस्था से।

मोमबत्ती और मशाल

 मोमबत्ती और मशाल


नगर के बीचों-बीच एक चौराहा था। वहाँ दो वस्तुएँ रखी थीं—एक छोटी-सी मोमबत्ती और एक जलती हुई मशाल।


मोमबत्ती मुस्कुराकर बोली, "मैं अँधेरा दूर करने के लिए जलती हूँ।"


मशाल हँस पड़ी, "मैं भी उजाला करती हूँ, लेकिन जब कोई मुझे गुस्से में उठा लेता है, तो मैं रास्ता नहीं, घर जला देती हूँ।"


इतने में कुछ युवा वहाँ पहुँचे। उनके हाथों में नारे थे, आँखों में आक्रोश।


एक वृद्ध ने उनसे पूछा, "तुम्हारा उद्देश्य क्या है?"


उन्होंने कहा, "न्याय चाहिए।"


वृद्ध बोले, "न्याय माँगना गलत नहीं है। लेकिन यदि न्याय की राह में कानून टूटे, दूसरों की पढ़ाई रुके, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचे और समाज में वैमनस्य फैले, तो नुकसान किसका होगा? सरकार का... या पूरे देश का?"


युवाओं ने कोई उत्तर नहीं दिया।


वृद्ध ने आगे कहा, "सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन राष्ट्र स्थायी होता है। यदि किसी निर्णय पर असहमति है, तो संविधान ने न्यायालय, संवाद और शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति के रास्ते दिए हैं। वही लोकतंत्र की शक्ति है।"


पास खड़ी मोमबत्ती बोली, "मैं कम जलती हूँ, पर उजाला करती हूँ।"


मशाल ने सिर झुका लिया, "और मैं जब क्रोध के हाथों में चली जाती हूँ, तो उजाले से अधिक धुआँ फैलाती हूँ।"


युवाओं ने अपने नारे नहीं छोड़े, लेकिन उनका तरीका बदल गया। उन्होंने तय किया कि वे अपनी बात तथ्यों, तर्कों और संवैधानिक तरीकों से रखेंगे।


उस दिन किसी की जीत या हार नहीं हुई। जीता तो केवल लोकतंत्र, जिसने सिखाया कि अधिकार और कर्तव्य साथ-साथ चलते हैं।


संदेश:


"लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं है, लेकिन कानून का सम्मान प्रत्येक नागरिक का धर्म है। आवाज़ बुलंद हो, पर विवेक उससे भी ऊँचा हो।"

एक सवाल, जो हम सबको खुद से पूछना चाहिए...

 🔴 एक सवाल, जो हम सबको खुद से पूछना चाहिए...


पहले लोग कहते थे—"इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।"

आज लगता है—इंसान की जान सबसे सस्ती चीज़ हो गई है।


सुबह अख़बार खोलिए, रात का समाचार देखिए—कहीं पत्नी ने पति की हत्या कर दी, कहीं पति ने पत्नी की जान ले ली। कहीं बेटे ने बूढ़े माँ-बाप को मार डाला, कहीं माता-पिता ने अपने ही बच्चों का जीवन छीन लिया। छोटी-सी कहासुनी, थोड़ी-सी नाराज़गी, कुछ रुपये, थोड़ा-सा शक... और फैसला सीधे मौत!


सोचिए, हम किस समाज की ओर बढ़ रहे हैं?


जिस घर में बच्चों को प्रेम, धैर्य और संवाद सीखना था, वहाँ वे हिंसा देख रहे हैं। जिस समाज में कानून का डर होना चाहिए था, वहाँ अपराधी बेखौफ दिखाई देते हैं। जिस व्यवस्था का काम नागरिकों को सुरक्षा देना है, उसे केवल घटनाओं के बाद जागना नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पहले से सक्रिय होना होगा।


जब हत्या एक खबर बनकर रह जाए और संवेदना कुछ घंटों में खत्म हो जाए, तब समझ लीजिए कि खतरा केवल किसी एक परिवार पर नहीं, पूरे समाज पर है।


आज ज़रूरत केवल कठोर कानून की नहीं, बल्कि परिवारों में संवाद, समाज में संवेदना और प्रशासन की सतर्कता की भी है। हर हत्या केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, वह समाज के चरित्र पर लगा एक गहरा घाव होती है।


आइए, ऐसी व्यवस्था और ऐसा समाज बनाने की मांग करें जहाँ किसी की जान लेना आसान नहीं, बल्कि कानून का भय और इंसानियत का सम्मान सबसे बड़ा हो।


क्या हम आने वाली पीढ़ी को प्रेम का समाज देंगे या हिंसा की विरासत?



सब्ज़ी मंडी का सबसे महँगा माल

 सब्ज़ी मंडी का सबसे महँगा माल


सुबह-सुबह सब्ज़ी मंडी में बड़ी भीड़ थी।


एक आदमी खीरे वाले से बोला, "भैया, खीरा कितने का दिया?"


सब्ज़ी वाले ने मुस्कुराकर कहा, "साहब, पचास रुपये किलो।"


आदमी ने एक-एक खीरा हाथ में लेकर देखा, दबाया, पलटा और फिर बोला, "ज़रा संभालकर तौलना, कहीं कटा-फटा न हो।"


पास ही खड़ा एक बूढ़ा यह दृश्य देख रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी मुस्कान थी—मुस्कान कम, दर्द ज़्यादा।


वह धीरे से बोला, "वाह रे इंसान... खीरा खरीदते समय तुझे उसकी सलामती की चिंता है, लेकिन इंसान मर जाए तो तू दो मिनट का वीडियो बनाकर आगे बढ़ जाता है।"


सब चुप हो गए।


बूढ़ा फिर बोला—


"आजकल खीरा काटने से पहले लोग सोचते हैं, लेकिन इंसान को काटने से पहले नहीं सोचते।"


एक पल के लिए मंडी जैसे थम गई।


कल ही अख़बार में खबर थी—पत्नी ने पति की हत्या कर दी। परसों खबर थी—पति ने पत्नी की जान ले ली। कहीं बेटे ने बूढ़े माँ-बाप को मार दिया, कहीं माँ-बाप ने अपने ही बच्चों का गला घोंट दिया। बाहर निकलिए तो सड़क पर छोटी-सी बहस जानलेवा हो जाती है।


लगता है अब मौत का कारण नफ़रत नहीं, आदत बनती जा रही है।


बूढ़े ने आसमान की ओर देखा और धीमे से कहा—


"हे भगवान! तूने धरती पर इंसान भेजे थे या चलते-फिरते हथियार?"


सब्ज़ी वाला पहली बार अपनी दुकान से बाहर निकला। उसने अपने खीरों को देखा और फिर सामने खड़े लोगों को।


आज उसे पहली बार लगा कि उसकी दुकान में सबसे सस्ती चीज़ खीरा है।


सबसे महँगी चीज़ तो इंसान की जान होनी चाहिए थी...


लेकिन अफ़सोस...


अब वह सबसे सस्ती हो गई है।


और इससे बड़ा व्यंग्य क्या होगा कि इस देश में लोग सब्ज़ियाँ खरीदते समय मोलभाव करते हैं, पर नफ़रत बाँटते समय एक पल का भी हिसाब नहीं रखते।


कहते हैं, सभ्यता आगे बढ़ रही है।


शायद सच है...


क्योंकि अब हत्या करने के तरीक़े आधुनिक हो गए हैं, लेकिन इंसानियत आज भी अपनी लाठी टेककर किसी पुराने गाँव की पगडंडी पर बैठी रो रही है।


प्रश्न केवल यह नहीं कि हत्यारे कौन हैं। प्रश्न यह भी है कि ऐसा समाज बनने दिया किसने, जहाँ इंसान की जान से ज़्यादा कीमत मोबाइल की स्क्रीन पर चलती हुई एक "ब्रेकिंग न्यूज़" की रह गई है।

जब मौत सस्ती हो गई (व्यंग्यात्मक कहानी)

 जब मौत सस्ती हो गई


उस दिन यमराज बड़े परेशान थे।


चित्रगुप्त ने पूछा, "महाराज, आज इतने चिंतित क्यों हैं?"


यमराज ने एक लंबी साँस ली और बोले, "पहले मुझे किसी की आयु पूरी होने का इंतज़ार करना पड़ता था। अब तो इंसान खुद ही मेरा काम छीनने लगा है।"


चित्रगुप्त ने आश्चर्य से पूछा, "कैसे?"


यमराज ने पृथ्वी की ओर इशारा किया।


"देखो... वहाँ एक पति, अपनी पत्नी का जीवन छीन रहा है। दूसरी ओर एक पत्नी, अपने पति की हत्या की योजना बना रही है। कहीं बेटा बूढ़े माँ-बाप पर हाथ उठा रहा है, तो कहीं पिता अपने ही बच्चे का भविष्य नहीं, जीवन खत्म कर रहा है। सड़क पर मामूली विवाद तलवार बन जाता है, और गुस्सा अब सीधे श्मशान का रास्ता पूछता है।"


चित्रगुप्त चुप हो गए।


कुछ देर बाद उन्होंने धीरे से कहा, "महाराज, क्या धरती पर इंसान कम हो गए हैं?"


यमराज बोले, "नहीं... इंसान तो उतने ही हैं, लेकिन इंसानियत कम हो गई है।"


उसी समय धरती से एक आवाज़ आई—


"ब्रेकिंग न्यूज़... एक और हत्या!"


न्यूज़ एंकर ने खबर पढ़ी। लोगों ने वीडियो देखा। कुछ ने दुख जताया, कुछ ने बहस की, कुछ ने आगे बढ़कर अगली खबर देख ली।


यमराज मुस्कुराए, लेकिन उस मुस्कान में गहरा दर्द था।


"चित्रगुप्त, अब मुझे मृत्यु से डर नहीं लगता। डर इस बात का है कि जिस समाज में हत्या एक खबर बन जाए और संवेदना कुछ मिनटों की मेहमान रह जाए, वहाँ जीवन की कीमत कौन समझाएगा?"


चित्रगुप्त ने अपनी पोथी बंद कर दी।


उन्होंने पहली बार लिखा—


"आज धरती पर मौत नहीं बढ़ी है... जीवन सस्ता हो गया है।"


और शायद यही हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य है।


हम सब्ज़ी खरीदते समय ताज़गी देखते हैं, कपड़े खरीदते समय गुणवत्ता देखते हैं, मोबाइल खरीदते समय गारंटी पूछते हैं...


लेकिन किसी इंसान की जान लेते समय न रिश्ता याद आता है, न कानून, न भगवान और न ही अपनी आत्मा।


कभी सोचिए...


अगर यही सभ्यता है, तो फिर जंगलों को बदनाम करने का हमें कोई अधिकार नहीं।

मेरी माँ की आसमानी साड़ी कहानी

 मेरी माँ की आसमानी साड़ी

कहते हैं, किसी घर की सबसे कीमती चीज़ सोना-चाँदी नहीं होती, बल्कि वे यादें होती हैं जो वर्षों बाद भी साँस लेती रहती हैं।

मेरे घर में भी एक ऐसी ही धरोहर थी—मेरी माँ की आसमानी रंग की सूती साड़ी।

वह कोई बनारसी नहीं थी... न उस पर ज़री का काम था... न कोई महँगी कढ़ाई...

लेकिन उस साड़ी के हर धागे में मेरी माँ का जीवन बुना हुआ था।

बचपन से मैंने माँ को उसी साड़ी में सबसे अधिक देखा।

सुबह वह उसे धोतीं... आँगन की रस्सी पर सुखातीं... दोपहर की धूप उसे फिर पहनने लायक बना देती... और शाम तक वही साड़ी फिर माँ के शरीर पर होती।

तब मैं सोचती थी— "क्या माँ को नई साड़ियाँ पसंद नहीं?"

आज समझती हूँ...

उन्हें नई साड़ियाँ पसंद थीं, लेकिन उनसे कहीं ज़्यादा अपने बच्चों के सपने प्रिय थे।

उसी आसमानी साड़ी में माँ मुझे स्कूल छोड़ने जाती थीं।

उसी साड़ी में मेरी फीस भरती थीं।

उसी साड़ी में मेरी परीक्षा के बाहर घंटों इंतज़ार करती थीं।

उसी साड़ी में रिश्तेदारों की शादियों में जातीं, जहाँ लोग उनके कपड़ों को देखते थे और मैं उनकी मुस्कान को।

मुझे आज भी याद है...

किसी दुकान पर मेरी नज़र किसी फ्रॉक या सूट पर टिक जाती, तो माँ बिना एक पल सोचे कहतीं—

"इसे पैक कर दीजिए।"

दुकानदार जब पूछता— "बहन जी, आपके लिए भी कोई साड़ी दिखाऊँ?"

तो माँ मुस्कुरा देतीं—

"नहीं... मेरी वाली अभी बिल्कुल ठीक है।"

वह "अभी" कई वर्षों तक चलता रहा।

माँ अपनी इच्छाओं को हर बार धोकर, सुखाकर, तह लगाकर फिर पहन लेती थीं।

लेकिन हमारी इच्छाएँ कभी पुरानी नहीं होने देती थीं।

समय बदला।

हम पढ़े, आगे बढ़े, अपने पैरों पर खड़े हुए।

अब मेरी अलमारी से पहले माँ की अलमारी भरने लगी।

हर त्योहार पर मैं उनके लिए साड़ी लाती।

कभी रेशमी... कभी छपाई वाली... कभी उनकी पसंद का हल्का गुलाबी रंग... कभी गहरा हरा...

मुझे लगता था— अब माँ की अधूरी इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी।

लेकिन माँ नई साड़ियाँ अलमारी में सहेजकर रख देतीं और रोज़ फिर वही आसमानी साड़ी पहन लेतीं।

मैंने एक दिन थोड़ा रूठकर पूछा—

"माँ, मेरी लाई हुई साड़ियाँ अच्छी नहीं लगतीं क्या?"

उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

"बेटी... साड़ी सिर्फ़ कपड़ा नहीं होती, उसमें उम्र के बरस, रिश्तों की खुशबू और बच्चों के बचपन की सिलवटें भी बस जाती हैं। यह आसमानी साड़ी अब मेरी आदत नहीं... मेरी ज़िंदगी है।"

उस दिन भी मैं पूरी तरह नहीं समझी।

फिर...

एक दिन माँ चली गईं।

इतनी चुपचाप कि घर की दीवारें भी कई दिनों तक उन्हें पुकारती रहीं।

जब उनकी अलमारी खोली, तो मेरी दी हुई साड़ियाँ लगभग नई थीं।

कई पर तो अब भी तह वैसी ही थी, जैसी दुकान से आई थीं।

और सबसे ऊपर रखी थी...

वही आसमानी साड़ी।

मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया।

उसमें अब भी साबुन की हल्की-सी महक थी...

और माँ के आँचल की गर्माहट जैसे कहीं छिपी हुई थी।

आज माँ मेरे साथ नहीं हैं...

लेकिन बैठक की दीवार पर टँगी उसी आसमानी साड़ी में मुस्कुराती उनकी तस्वीर हर दिन मुझसे बात करती है।

जब भी मैं उसे देखती हूँ, लगता है जैसे माँ अभी कहेंगी—

"बेटी... अपना ध्यान रखना।"

उस तस्वीर के सामने खड़े-खड़े अक्सर सोचती हूँ...

कभी इस घर में एक ऐसी स्त्री रहती थी, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी एक साड़ी को बार-बार धोकर पहन ली...

ताकि उसकी बेटी कभी अभावों को पहनने के लिए मजबूर न हो।

आज मेरी अलमारी में साड़ियों की कमी नहीं है।

लेकिन हर नई साड़ी को हाथ में लेते ही आँखें उस पुरानी आसमानी साड़ी को खोजने लगती हैं...

क्योंकि अब समझ आया है—

साड़ी की कीमत उसके कपड़े से नहीं, उसे पहनने वाली माँ के त्याग से तय होती है।

और जीवन का सबसे बड़ा दुःख यह नहीं कि माँ के पास कभी साड़ियाँ कम थीं...

सबसे बड़ा दुःख यह है कि जब मैं उन्हें दुनिया की सबसे सुंदर साड़ियाँ पहनाना चाहती थी, तब उन्हें पहनने के लिए मेरी माँ ही इस दुनिया में नहीं थीं।

दीवार पर टँगी उनकी वह आसमानी साड़ी वाली तस्वीर आज भी मुस्कुरा रही है...

शायद इसलिए कि माँ कभी जाती नहीं।

वे अपने बच्चों की स्मृतियों में, अपने आँचल की खुशबू में और अपनी पुरानी साड़ियों की तहों में हमेशा जीवित रहती हैं।

— डॉ. नीरू मोहन