सब्ज़ी मंडी का सबसे महँगा माल
सुबह-सुबह सब्ज़ी मंडी में बड़ी भीड़ थी।
एक आदमी खीरे वाले से बोला, "भैया, खीरा कितने का दिया?"
सब्ज़ी वाले ने मुस्कुराकर कहा, "साहब, पचास रुपये किलो।"
आदमी ने एक-एक खीरा हाथ में लेकर देखा, दबाया, पलटा और फिर बोला, "ज़रा संभालकर तौलना, कहीं कटा-फटा न हो।"
पास ही खड़ा एक बूढ़ा यह दृश्य देख रहा था। उसकी आँखों में एक अजीब-सी मुस्कान थी—मुस्कान कम, दर्द ज़्यादा।
वह धीरे से बोला, "वाह रे इंसान... खीरा खरीदते समय तुझे उसकी सलामती की चिंता है, लेकिन इंसान मर जाए तो तू दो मिनट का वीडियो बनाकर आगे बढ़ जाता है।"
सब चुप हो गए।
बूढ़ा फिर बोला—
"आजकल खीरा काटने से पहले लोग सोचते हैं, लेकिन इंसान को काटने से पहले नहीं सोचते।"
एक पल के लिए मंडी जैसे थम गई।
कल ही अख़बार में खबर थी—पत्नी ने पति की हत्या कर दी। परसों खबर थी—पति ने पत्नी की जान ले ली। कहीं बेटे ने बूढ़े माँ-बाप को मार दिया, कहीं माँ-बाप ने अपने ही बच्चों का गला घोंट दिया। बाहर निकलिए तो सड़क पर छोटी-सी बहस जानलेवा हो जाती है।
लगता है अब मौत का कारण नफ़रत नहीं, आदत बनती जा रही है।
बूढ़े ने आसमान की ओर देखा और धीमे से कहा—
"हे भगवान! तूने धरती पर इंसान भेजे थे या चलते-फिरते हथियार?"
सब्ज़ी वाला पहली बार अपनी दुकान से बाहर निकला। उसने अपने खीरों को देखा और फिर सामने खड़े लोगों को।
आज उसे पहली बार लगा कि उसकी दुकान में सबसे सस्ती चीज़ खीरा है।
सबसे महँगी चीज़ तो इंसान की जान होनी चाहिए थी...
लेकिन अफ़सोस...
अब वह सबसे सस्ती हो गई है।
और इससे बड़ा व्यंग्य क्या होगा कि इस देश में लोग सब्ज़ियाँ खरीदते समय मोलभाव करते हैं, पर नफ़रत बाँटते समय एक पल का भी हिसाब नहीं रखते।
कहते हैं, सभ्यता आगे बढ़ रही है।
शायद सच है...
क्योंकि अब हत्या करने के तरीक़े आधुनिक हो गए हैं, लेकिन इंसानियत आज भी अपनी लाठी टेककर किसी पुराने गाँव की पगडंडी पर बैठी रो रही है।
प्रश्न केवल यह नहीं कि हत्यारे कौन हैं। प्रश्न यह भी है कि ऐसा समाज बनने दिया किसने, जहाँ इंसान की जान से ज़्यादा कीमत मोबाइल की स्क्रीन पर चलती हुई एक "ब्रेकिंग न्यूज़" की रह गई है।
No comments:
Post a Comment