Thursday, 28 May 2026

शिकायतों की बस्ती कहानी

 शिकायतों की बस्ती


उस बस्ती का नाम “आनंदनगर” था,

नाम सुनकर लगता था जैसे वहाँ सिर्फ खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी…

लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट थी।


वहाँ हर घर के दरवाज़े पर एक बोर्ड टंगा था —

“यहाँ शिकायतें स्वीकार की जाती हैं।”


सुबह होते ही पहला व्यक्ति निकलता और कहता,

“आज सूरज देर से निकला है, सरकार को देखना चाहिए…”

दूसरा कहता,

“चाय में स्वाद नहीं है, पूरी व्यवस्था खराब है…”


तीसरा व्यक्ति सबसे बड़ा विशेषज्ञ था,

उसे हर चीज़ में कमी दिखती थी —

“अगर मैं होता तो दुनिया बदल देता…”

लेकिन वह सिर्फ कुर्सी पर बैठकर हवा बदलता रहता था।


बस्ती में एक बूढ़ी महिला रहती थी, नाम था सुमित्रा।

वह बहुत कम बोलती थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अलग ही चमक थी।

वह शिकायत नहीं करती थी… बस काम करती थी।


लोग उसे देखकर हँसते,

“अरे सुमित्रा! तुम भी कुछ तो शिकायत करो, वरना लोग क्या कहेंगे?”


वह मुस्कुराकर कहती —

“मुझे शिकायत करने से फुर्सत नहीं,

मैं अपने हिस्से की जिंदगी जीने में व्यस्त हूँ।”


धीरे-धीरे अजीब बात होने लगी…

जो लोग रोज़ शिकायत करते थे, वे और थकने लगे।

उनके चेहरे पर हमेशा असंतोष रहता था।


और सुमित्रा…

वह कम बोलते हुए भी सबसे शांत और संतुष्ट दिखती थी।


एक दिन बस्ती में बहुत बड़ा तूफान आया।

घर टूटे, सामान बिखरा, लोग परेशान हो गए।

सब लोग इकट्ठा होकर फिर शिकायतें करने लगे —

“ये मौसम भी हमारी किस्मत जैसा है…”


लेकिन सुमित्रा ने सबको बुलाया और कहा,

“अगर हम हर चीज़ में शिकायत ही करेंगे,

तो इसे सुधार कौन करेगा?”


उस दिन पहली बार बस्ती के कुछ लोगों ने चुपचाप काम शुरू किया।

कोई मलबा हटाने लगा, कोई घर जोड़ने लगा…


धीरे-धीरे बदलाव आने लगा।


और जिस बस्ती का नाम “आनंदनगर” सिर्फ नाम में था,

वह सच में आनंद देने लगी…


क्योंकि वहाँ लोगों ने शिकायत करना कम और प्रयास करना शुरू कर दिया था।


और सुमित्रा?

वह अब भी वही थी — शांत, सरल और मुस्कुराती हुई…

लेकिन अब लोग उसे “बदलाव की शुरुआत” कहने लगे थे।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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