तन्हाई : भीड़ में खोया हुआ अपना ही चेहरा
तन्हाई कभी अकेले कमरे की चार दीवारों में नहीं मिलती,
वह तो अक्सर भीड़ के शोर में धीरे से आकर कंधे पर हाथ रख देती है।
जब अपने ही लोग पास बैठकर भी मन की आवाज़ नहीं सुनते, तब तन्हाई जन्म लेती है।
आज का मनुष्य हर क्षण किसी-न-किसी स्क्रीन से जुड़ा है,
पर अपने भीतर से कटता जा रहा है।
मोबाइल की घंटियाँ बढ़ रही हैं,
पर दिलों की बातचीत कम हो रही है।
चेहरों पर मुस्कान है,
लेकिन आँखों में एक सूना-सा आकाश फैला हुआ है।
तन्हाई केवल प्रेम में बिछड़ने का नाम नहीं,
यह उस पीड़ा का नाम है जब इंसान अपनी ही पहचान से दूर हो जाए।
जब घर में सब हों, फिर भी मन बात करने के लिए तरस जाए।
जब सफलता की ऊँचाइयाँ भी भीतर के खालीपन को न भर सकें।
कभी-कभी तन्हाई आदमी को तोड़ती नहीं,
उसे अपने असली रूप से मिलाती है।
यह वही समय होता है जब मन स्वयं से प्रश्न करता है—
“क्या मैं सच में वही हूँ, जो दुनिया देख रही है?”
रिश्तों की विडंबना देखिए,
आज लोग साथ रहने की औपचारिकता निभाते हैं,
पर एक-दूसरे के दुख का भार उठाने से बचते हैं।
हर कोई अपनी दौड़ में इतना व्यस्त है कि किसी के भीतर की चुप्पी सुनने का समय नहीं।
तन्हाई का सबसे बड़ा दर्द यह नहीं कि कोई हमारे पास नहीं,
बल्कि यह है कि जिसे हम अपना मानते हैं,
वह हमारे मौन को भी समझना छोड़ दे।
परंतु तन्हाई हमेशा अभिशाप नहीं होती।
कभी यही तन्हाई कवि की कविता बनती है,
लेखक का लेख बनती है,
चित्रकार के रंगों में उतरती है,
और साधक की साधना बन जाती है।
जिसने तन्हाई को मित्र बना लिया,
उसने जीवन का सबसे गहरा सत्य जान लिया।
सच तो यह है कि मनुष्य जन्म से अकेला आता है और अकेला ही चला जाता है।
बीच का सारा जीवन केवल संबंधों का मेला है।
कुछ लोग साथ चलते हैं,
कुछ लोग याद बन जाते हैं,
और कुछ लोग तन्हाई का कारण।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि हमारे पास कितने लोग हैं,
बल्कि इस बात की है कि कितने लोग हमारे मौन को सुन सकते हैं।
क्योंकि शब्दों से जुड़े रिश्ते अक्सर टूट जाते हैं,
पर जो रिश्ते खामोशी समझ लें, वे उम्रभर साथ रहते हैं।
तन्हाई हमें यह सिखाती है कि
दुनिया का सबसे मजबूत सहारा अंततः हमारा अपना मन ही होता है।
यदि मन टूट जाए तो भीड़ भी सूनी लगती है,
और यदि मन मजबूत हो जाए तो अकेलापन भी साधना बन जाता है।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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