“तन्हाई का डिजिटल महोत्सव”
आज का मनुष्य बड़ा भाग्यशाली है।
उसके पास हजारों “फ्रेंड्स” हैं,
सैकड़ों “फॉलोअर्स” हैं,
दर्जनों ग्रुप हैं,
लेकिन दुख बाँटने के लिए एक इंसान नहीं है।
पहले लोग घरों में रहा करते थे,
अब “ऑनलाइन” रहा करते हैं।
रिश्ते दिल से नहीं,
डेटा पैक से चलते हैं।
जैसे ही नेटवर्क कमजोर हुआ,
अपनापन भी बफर होने लगता है।
सुबह-सुबह लोग भगवान से पहले मोबाइल का दर्शन करते हैं।
कुछ लोग तो ऐसे श्रद्धालु हैं कि
आँख खुलते ही सबसे पहले नोटिफिकेशन को प्रणाम करते हैं।
अगर रातभर में कोई मैसेज न आया हो,
तो उन्हें लगता है कि समाज ने उनका बहिष्कार कर दिया है।
अब हाल यह है कि
घर में पिता बेटे से बात करने के लिए भी व्हाट्सऐप पर “कहाँ हो?” भेज देते हैं,
जबकि बेटा सामने वाले कमरे में बैठा होता है।
माँ रोटी लेकर बुलाती रहती है,
और बच्चा वीडियो में किसी मोटिवेशनल गुरु से सुन रहा होता है—
“परिवार को समय देना चाहिए।”
पति-पत्नी का प्रेम भी अब आधुनिक हो चुका है।
पहले लोग आँखों में आँखें डालकर बातें करते थे,
अब मोबाइल की स्क्रीन में झाँककर शक करते हैं।
“लास्ट सीन किसके लिए छुपाया है?”
यही आज के प्रेम का सबसे बड़ा दार्शनिक प्रश्न है।
लोग कहते हैं—
“हम बहुत बिज़ी हैं।”
असल में वे व्यस्त नहीं,
व्यर्थ हैं।
पूरा दिन उंगलियाँ चलती रहती हैं,
पर रिश्ते ठहरे रहते हैं।
आज आदमी को पड़ोसी की बीमारी का पता नहीं चलता,
लेकिन किसी अभिनेता ने सुबह नाश्ते में क्या खाया,
यह खबर तुरंत मिल जाती है।
समाज इतना जागरूक हो चुका है कि
देश की चिंता कम और सेलिब्रिटी के तलाक की चिंता ज्यादा होने लगी है।
सबसे बड़ा मज़ाक यह है कि
हर आदमी तन्हाई पर दुखी है,
लेकिन कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं।
सब बोलना चाहते हैं,
सुनना कोई नहीं चाहता।
अब इंसान अकेला बैठने से डरता है।
क्योंकि जैसे ही शोर बंद होता है,
मन की अदालत शुरू हो जाती है।
और वहाँ कोई वकील नहीं होता,
सिर्फ सच खड़ा होता है।
इसलिए लोग हर समय कुछ-न-कुछ चलाए रखते हैं—
मोबाइल, टीवी, गाने, रीलें, शोर…
बस आत्मा की आवाज़ सुनाई नहीं देनी चाहिए।
आधुनिकता ने आदमी को “स्मार्ट” तो बना दिया,
लेकिन संवेदनाएँ “लो बैटरी” पर डाल दीं।
अब लोग चार्जर साथ रखना नहीं भूलते,
पर रिश्तों को चार्ज करना भूल गए हैं।
और अंत में हर आदमी रात को यही सोचते हुए सो जाता है—
“इतने संपर्कों के बाद भी,
आख़िर मेरा अपना कौन है?”
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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