Friday, 29 May 2026

“तन्हाई की चौखट पर बैठा मन” कहानी

 “तन्हाई की चौखट पर बैठा मन”


भीड़ बहुत थी शहरों में,

पर अपना कोई मिला नहीं,

हर चेहरा मुस्कान लिए था,

पर भीतर कोई खिला नहीं।


रिश्तों की गर्मी खोती गई,

शब्दों में अपनापन कम था,

हर घर रोशन दिखता था पर,

हर दिल भीतर से नम था।


दिन भर मेले लगते देखे,

रात मगर सुनसान मिली,

अपनों की आवाज़ों में भी,

मन को केवल थकान मिली।


कितने चेहरे पास खड़े थे,

फिर भी मन वीरान रहा,

जैसे सूखी नदी किनारे,

प्यासा कोई इंसान रहा।


तन्हाई ने धीरे-धीरे,

मन को जीना सिखलाया,

टूटे सपनों की राखों में,

जीवन का दीप जलाया।


जब-जब दुनिया ने ठुकराया,

मन ने खुद को थाम लिया,

आँसू पीकर होंठों ने भी,

हँसने का इल्ज़ाम लिया।


सच है, कुछ रिश्ते ऐसे हैं,

जो बस बोझ उठाते हैं,

साथ खड़े दिखते सबको,

भीतर से मर जाते हैं।


कितनी बातें मन में थीं पर,

किससे जाकर कहता मैं,

अपने ही जब दूर हुए तो,

किसको अपना कहता मैं।


तन्हाई अब शत्रु नहीं है,

यह मेरी पहचान बनी,

सूनेपन की काली रातें,

मेरे मन की जान बनी।


अब चुप रहकर भी लगता है,

मन सबसे बातें करता है,

दर्द अगर सच्चा हो भीतर,

आँसू कविता बनता है।


जीवन का यह सत्य कठिन है,

सबको समझ नहीं आता,

भीतर से जो टूट चुका हो,

वह कम ही मुस्कुराता।


फिर भी मन उम्मीद लिए है,

कोई तो अपना होगा,

जो मेरी खामोशी पढ़कर,

मन का दीपक होगा।


✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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