Tuesday, 19 December 2017

हाइकु part 1

"हाइकु"
यह जापान की सबसे अधिक प्रचलित विधा है और कालांतर में भारत में भी  इस विधा पर बहुत काम हुआ है । प्रारम्भ में प्रकृति के सौंदर्य के वर्णन से होते हुए अब ये विधा सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ चुकी है ।
हाइकु लिखने की कला…

1) हाइकु में कुल तीन पंक्तियाँ  और सत्रह वर्ण  होते  हैं ।
2) इसमें आधा वर्ण  नहीं गिना जाता ,
जैसे अच्छा --दो वर्ण
3) हाइकु की प्रथम एवं तृतीय पंक्ति में पाँच वर्ण  तथा दूसरी पंक्ति में सात वर्ण  होते हैं।
4) हाइकु की तीनो पंक्तियाँ स्वतंत्र होती हैं 5) एक पंक्ति को तोड़-मरोड़ के तीन पंक्ति बना देना हाइकु नहीं है ।
6) हाइकु बिम्ब विधान की बोली द्वारा बोलता है ।
7) एक अच्छे हाइकु की तीनो पंक्तियाँ सर्वथा पूर्ण स्वतंत्र होती हैं लेकिन तीनों मिलकर एक बड़ी और प्रभाव पूर्ण कविता रचती हैं ।
8) सतही ..हल्की फुल्की अभिव्यक्तियाँ हाइकु की प्रकृति से मेल नहीं खाती ..
9) किसी वाक्य कथन को ..5-7-5  के वर्णक्रम या बिम्बरहित भाव ..सतही तुकबंदियाँ हाइकु नहीं होते ।
10) हाइकु में यदि गहन भावबोध या पूर्ण बिम्ब की रचना नहीं हो पाती तो हाईकु अपनी प्रखरता खोने लगता है ।
चूंकि हाइकु बिम्ब प्रधान होता है ।

          

मिट्टी का माधो
मत बन इंसान
जीवन साध

क्रोध है आता
भवंडर मचाता
त्रासदी लाता

प्रात: की बेला
उदित प्रभाकर
लगा है मेला

तरु की छाया
है राहत दिलाए
प्रभु की माया

बही बयार
मुस्काई है प्रकृति
गाए मल्हार

सर्दी की मार
गरीब सहे जाए
दिखे लाचार

कुर्सी के मारे
नेता सभी हमारे
लगाएँ नारे

स्वार्थ में नेता
करता है पाखंड
बेहाली देता

सद् विचार
बढ़े कुल की शान
सजे आचार

ज्ञान कुबेर
प्रवाहित हमेशा
भौर सवेर

वंदनवार
सुशोभित है द्वार
आए बहार

शिक्षक सारे
ज्ञान…गुणों की खान
प्राण सँवारे

विद्या है धन
निष्फल न ये जाए
बढ़ाए ज्ञान

जीवन पथ
अथक परिश्रम
बने सुपथ

छात्र-छात्राओं
अनुशासित रहो
विद्या को पाओ

अथक श्रम
आशाएँ फलीभूत
रे मन झूम

सर्द हवाएँ
दरिद्र को सताएँ
बहती आएँ

ऊँची फुनगी
नीड़ से सुसज्जित
विहग संगी

उत्तम कर्म
सम्मान हैं बढ़ाते
मिटे अधर्म

प्रकृति सारी
पोषित है करती
धरा हमारी

बने है ज्ञानी
अज्ञान में अज्ञानी
करे नादानी

कटु वचन
अहंकार से भरे
मलिन मन

तिरंगा प्यारा
गणतंत्र हमारा
सबसे न्यारा

राम की सिया
वनवासिनी हुई
संग हैं पिया     

पढ़ें बेटियाँ
शिक्षित परिवार
मिलें खुशियाँ   

ज्ञान का दीप
विद्यार्थी हैं प्रदीप्त
देश संदीप

शीत लहर
बारिश संग आए
मेरे शहर

बेबस नारी
कुछ कह न पाती
सहे लाचारी   

तन्हा जीवन
खुशी की तालाश में
नहीं मिलन

मन की पीर
घायल कर जाती
बहते नीर

दामन करे
चीख पुकार अब
मासूम मरे

नैतिक मूल्य
रह गए है कम
शिक्षा का अंत

भावी पीढ़ी है
अंधकार में लुप्त
शिक्षा त्रुटिपूर्ण

छात्र हुए है
अनुशासनहीन
शिक्षक मूढ़

भेड़चाल है
देश बदहाल है
शिक्षा कहाँ है

सुप्त शासन
अपना राज-काज
स्कूल आबाद

गूढ़ निर्बल
मूढ़ है सिरमौर
शिक्षा बेमोल

सद्आचरण
क्रोध का करे नाश
मन हो शांत

मिट्टी का माधो
मत बन इंसान
जीवन साध

क्रोध है आता
भवंडर मचाता
त्रासदी लाता

चाँदनी रैन
प्रकाशित है जग
श्यामल मन

संध्यागीत-सी
चाँदनी हुई शीत
उषा विलीन

मटमल व्योम
तिरछा रजनीश
सजन पीर

क्षीर्ण मंदार
पक्षीगृह प्रस्थान
शशि प्रकाश

गोधूलि बेला
निशापति प्रधान
तिमिर वास

करवा चौथ
साजन का श्रृंगार
मयंक बाट        

शब्दों का मेल
भाव सरिता बेल
हाइकु खेल

सुवर्ण दीप्ति
अरूण संग सृष्टि
सुभग वृति

अंबर तल
नभचर हैं मस्त
वृष्टि दे जल

अंबुद मन
आलस सब त्यज
नवसृजन                  

सांझ की बेला
आनंदित है मन
चित्त अकेला

रात चाँदनी
बिखरा-सा आँचल
पिया दामिनी       

चंद्र तारक
प्रकाश विस्तारक
तम नाशक

माँ का आँचल
होता जिनके पास
प्राण सफल    

हाइकु विधा
नहीं होती सुभीता
वागीश सुधा

मैया की गोद
सुरक्षित बहुत
मिले प्रमोद      

अटल मन
सन्मार्ग पर चल
सफल बन

वृति का वश
गहन अध्ययन
मिलेगा यश

दृढ़ विश्वास
कार्य के प्रति चाव
सफल प्रयास

चींटी का श्रम
कभी न हो विफल
नहीं ये भ्रम

गली का कुत्ता
सगा कभी न होता
जात दिखाता

कवि कलम
सच्चाई है दर्शाती
तम मिटाती

साहित्यधारा
कुसुमाकर भांति
चित संवारा

प्रभात संग
नवबेला आरंभ
मन प्रसन्न

हर्षित मन
स्वर्णिम प्रभात
खिला वदन

कल्पित रैना
संग उडु तारिका
तरसे नैना

सुवर्ण दीप्ति
अरूण संग सृष्टि
सुभग वृति

सड़क पार
करना है मुश्किल
भीड़ की मार

भारत देश
भिन्नताएँ अनेक
भाता स्वदेश

खर की पीर
भर्तार नहीं जाने
बने है क्रूर

करो उत्सर्ग
मोक्ष प्राप्त करोगे
मिलेगा स्वर्ग

है सेवाभाव
आत्मा की अनुभूति
हो आविर्भाव

गुरू बताए
संसार है पुस्तक
पढ़ी न जाए

बच्चे हमारे
नभ में जैसे तारे
ईश के प्यारे

सुनो!…… श्रीमान
सुरक्षा अभियान
बचाए जान

बच्चे मनाएँ
क्रिसमस त्योहार
तोहफ़ा पाएँ

बच्चे प्रसन्न
सेंटा का इंतज़ार
मीठे हैं स्वप्न

आँख में नीर
दर्द का संगी-साथी
सहता पीर

नयनजल
बयाँ दर्द करता
मिले न हल

सूर्याय नम:
नवबेला आरंभ
अमृत मन

विहग गान
स्वर्णिम उषाकाल
है सूर्यभान

अटल मन
सन्मार्ग पर चल
सफल बन

वृति का वश
गहन अध्ययन
मिलेगा यश

दृढ़ विश्वास
कार्य के प्रति चाव
सफल प्रयास

केक खिलाओ
बड़ा दिन है आया
तोहफ़ा पाओ

सेंटा की झोली
खुशियों की पोटली
बच्चों को भाए

तम फैलाए
मावस रजनीश
असित छाए

माँ का प्रणय
खरे सोने की खान
अभयदान     

मात आत्मज
आँचल में निर्भय
अंक में सोए        

कान्हा की बंसी
गोपियाँ इठलातीं
राधा खिजाती     

शैलजा तीर
राधिका की गगरी
फोड़े ललन         

श्याम मुरली
रास रचाए आली
रम्या दीवानी       

शूलों की सेज
राणा जी भिजवायो
कान्हा बचायो      

माखन खाए
रासलीला रचाए
कान्हा सताए

विष का प्याला
जब मीरा ने पिया
सोम हो गया      

दृढ़ विश्वास
पाई नई मंज़िल
सिद्ध प्रयास

सामान्य जाति
आरक्षण की मारी
फिरे है खाली

घर का भेदी
विभूषण कहाए
सुनामी लाए

किए जा कर्म
गहन अध्ययन
मिलेगा यश

अटल मन
सन्मार्ग पर चल
सफल बन              

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