Saturday, 3 June 2017

**टिम-टिम करता सुंदर तारा**बालगीत पहेली

**टिम-टिम करता सुंदर तारा**

विधा- गीत
नई पहेलियों से सजी बालगीत पहेली

*टिम-टिम करता

टिम-टिम करता

नभ में सुंदर तारा

टिम-टिम तारा

*नभ में चाँद निकलकर आया

रात ने डेरा डाला

टिम-टिम तारा

**रोज़ रात को नभ में आता

आड़े-तिरछे रुप दिखाता

कभी पूरा कभी आधा हो जाता

बोलो क्या बोलो-बोलो क्या

******चंदा मामा******

*टिम-टिम तारा

टिम-टिम तारा

नभ में सुंदर तारा

टिम-टिम तारा

**धरती की छत है कहलाता

काला नीला रंग लिए है

हाथ नहीं यह आता

बोलो क्या बोलो-बोलो क्या

*****आकाश*****

*टिम-टिम तारा

टिम-टिम तारा

नभ में सुंदर तारा

टिम-टिम तारा

**नभ में ही यह रहता है

रूई के जैसे दिखता है

शेर की तरह गरजता है

बोलो क्या बोलो-बोलो क्या

*****बादल*****

टिम -टिम तारा

टिम- टिम तारा

नभ में सुंदर तारा

टिम-टिम तारा

**नभ पूरा भर जाता है

अंधियारा जब आता

चाँद के संग में रास रचाने

नभ पर राज जमाता है

बोलो क्या बोलो-बोलो क्या

***** तारें *****

*टिम-टिम करता

टिम-टिम करता

नभ में सुंदर तारा

टिम-टिम तारा

*नभ में चाँद निकलकर आया

रात ने डेरा डाला

टिम-टिम तारा

*टिम-टिम तारा

टिम-टिम तारा

टिम-टिम करता तारा

टिम-टिम तारा********

Friday, 2 June 2017

**ईश्वर की कृपा जीवलोक तक**जापानी काव्य शैली-ताँका


**जापानी काव्य शैली-ताँका**
*संरचना- 5+7+5+7+7= 31 वर्ण
*दो कवियों के सहयोग से काव्य सृजन
*पहला कवि-5+7+5 = 17 भाग की रचना , *दूसरा कवि 7+7 की पूर्ति के साथ श्रृंखला को पूरी करता है |
*पूर्ववर्ती 7+7 को आधार बनाकर अगली श्रृंखला 5+7+5 यह क्रम चलता रहता है इसके आधार पर अगली श्रृंखला 7+7 की रचना होती है | इस काव्य श्रृंखला को रेंगा कहते थे |
5+7+5+7+7= 31 वर्ण

******कविता******

ईश्वर की कृपा जीव लोक तक

* प्रभु भजन
प्राकृतिक सौंदर्य
उत्साही मन
नई ऊषा किरण
नव प्रभात संग
नई उमंग
नव चेतना लिए
धरा प्रसन्न
हर्षित जन-जन
उल्लासित है मन
विहग करें
सुरीला कलरव
मन मयूर
तन डोले बे-ताल
सुहावनी प्रभात
अरूण संग
स्वर्णिम गगन
मलय बहे
सुगंधित भू-तल
जीव लोकप्रसन्न ||

Thursday, 1 June 2017

***मन हुआ मगन प्रकृति संग***जापानी काव्य शैली-चोका

जापानी कविता शैली -चोका
*5 और 7 वर्णों की आवृत्ति
*जापानी काव्य विद्या में महाकाव्य की कथा- कथानक शैली
*नियम- 5+7+5+7+5+7+5+7............और अंत में +7 का एक ताँका जोड़ दिया जाता है पंक्तियों का योग सदा विषम संख्या में यानी 25 27 29 31 इत्यादि ही होता है |

****कविता***
*मन हुआ मगन प्रकृति संग*
*मन प्रसन्न
हुआ यह मगन
विहग नभ
करते विचरण
शाम सुहानी
विलीन दिवाकर
प्रकृति शोभा
नभ तल चाँदनी
तटिनी जल
जन-जीवनदानी
चाँद शीतल
रजनी मतवाली
तारे चमके
जगमग गगन
क्षीर्ण नयन
छाई घोर कालिमा
जड़ मस्तिष्क
उमड़ता औत्सुक्य
नवप्रभात
प्रकट प्रभाकर
उषा किरण
आई सुभग बेला
आदि न अंत
सृष्टि नवसृजन
नमन-ही-नमन
****—-****

*व्याकरण प्रवाह** सुगम सरल व्याकरण बोध** भाग-२

अध्यापन कार्य में संपूर्ण अनुभव से यह पाया है कि छात्रों को हिंदी व्याकरण में व्याकरण संबंधी नियमों के प्रयोग में परेशानी होती है जिनमें मुख्य हैं  'कि'  'की'  का प्रयोग, अनुनासिक और अनुस्वार का प्रयोग , 'र' के सभी रूपों (रेफ, पदेन और टवर्ग वर्णों के साथ) का प्रयोग, विराम चिन्हों का प्रयोग इत्यादि | इस पृष्ठ पर गद्य और पद्य विद्या में सभी नियमों का ज्ञान सरल रूप में उपलब्ध है | जिनके अनुसरण से छात्र हिंदी व्याकरण का ज्ञान सरल और सुगम बना सकते हैं |

************ 'कि' और 'की'***********

*** अध्यापिका हूँ बच्चों की परेशानी भांप जाती हूँ |

कहाँ उन्हें है आती परेशानी जल्दी

पहचान जाती हूँ |

***आज तक के अनुभव से है यह पाया |

कहाँ लगाएँ 'कि' और 'की' बच्चों को आज तक समझ नहीं आया |

***पहली से बारहवीं तक के छात्रों का है यह हाल |

पता नहीं है 'कि' और 'की' का सही स्थान |

***नीरू कहे मत होना बच्चों कभी परेशान |

'कि' और 'की' की स्थिति पहचानने में कभी मत खाना मात |

*** 'कि' से पहले आता है हमेशा क्रिया शब्द याद रखना यह बात |

'की' को हमेशा लगाना संज्ञा और सर्वनाम के बाद |


****** 'कि' *****

***'कि' एक संयोजक शब्द है कहलाता |

जोड़ता दो वाक्य और वाक्यांशों को और अपना स्थान है बनाता |

***वाक्य बनाते समय बनता है अगर कोई प्रश्न |

वहाँ 'कि' लग जाता है |

मुख्य वाक्य को आश्रित वाक्य से जोड़ देता है,

और अपना स्थान बनाता है|

***पहले वाक्य के अंत में और दूसरे वाक्य के प्रारंभ में लग जाता है |

इसका प्रयोग विभाजन के लिए 'या' के स्थान पर भी किया जाता है |


****** 'की'******

***'की' के बाद स्त्रीलिंग शब्द का प्रयोग किया जाता है |

संज्ञा और सर्वनाम का किसी से संबंध जोड़ना हो ,

तो वहाँ 'की' लग जाता है |

***दो शब्दों को जोड़ने और संबंध स्थापित करने का कार्य भी 'की' ही करता है |

****'ताले की चाबी खो गई'

उदाहरण से पूर्ण स्पष्ट हो जाता है |

ताले और चाबी का संबंध 'की'

लगाकर जोड़ा जाता है |

***अगर रखोगे यह बातें याद कभी नहीं भूलोगे 'कि' और 'की' का सही स्थान |

*व्याकरण प्रवाह** सुगम सरल व्याकरण बोध** भाग-1

छंदयुक्त और छंदमुक्त कविताओं के माध्यम से हिंदी व्याकरण को सुगम और सरल बनाने का अथक प्रयास | इस पृष्ठ पर हिंदी व्याकरण के पाठों का काव्य सृजन उपलब्ध है | छात्रों की हिंदी व्याकरण से संबंधित कठिनाइयों का हल कविताओं के माध्यम से किया गया है जिसके माध्यम से छात्र हिंदी व्याकरण के ज्ञान को शीघ्र और सरलता से आत्मसात कर सकते हैं |

पाठ- १

भाषा, बोली, लिपि और व्याकरण

*****भाषा*****

भाषा के हैं दो ही रूप
मौखिक लिखित इसका स्वरूप
मौखिक है अस्थाई भाषा
जिसमें वाचन कौशल आता ||

लिखित स्थाई भाषा कहलाती
लेखन की हर विद्या इसमें समाती 
पुस्तके,समाचार पत्र,पत्रिकाएँ
लिखित प्राप्त सभी हो पाएँ ||

****हिंदी भाषा****

जनभाषा के रूप में मान्यता
 हिंदी ने ही पाई

राजभाषा, राष्ट्रभाषा और संपर्क भाषा 
हिंदी ही कहलाई

अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप में मान्यता
इसने पाई

हिंदी भाषा जन-जन ने
अपनाई ||

****हिंदी साहित्य****

हिंदी भाषा का सागर
हिंदी साहित्य कहलाता
गद्य, पद्य विद्या में रचा है जाता

सामान्य भाषा में गद्य पाया जाता
पत्र, लेख, संस्मरण है इसमे आता

काव्य शैली लिए जब होता है पद
पद्य साहित्य का स्वरूप बनाता

दोहा,पद,छंद और कविता
बढ़ती इनसे इसकी शोभा ||

****लिपि****

'इक' प्रत्यय से हुआ सृजन
जिसका है अर्थ 'लिखित अक्षर'

लिखने का ढंग लिपि कहलाया
मौखिक का लिखित रूप है पाया

ध्वनि चिह्न सब साथ में मिलकर 
देवनागरी लिपि में
हिंदी भाषा का स्वरूप उभर आया ||

****बोली****

'बोली' सीमित क्षेत्र में बोली जाती 
लिखित रूप,साहित्य में नहीं समाती

वृह्द क्षेत्र में उपभाषा प्रयोग में आती
साहित्य रचना भी इसमें की जाती

अनेक बोलियों को लेकर साथ
उपभाषा का हुआ विकास ||

****व्याकरण****

शुद्ध लिखने, बोलने, पढ़ने का
बोध कराता
नियमबद्ध भाषा शास्त्र है कहलाता
तीन भाग में बाँटा यह जाता
वर्ण-विचार,वाक्य-विचार
और शब्द-विचार इसमें समाता
भाषा के नियमों की जानकारी प्राप्त हो जिससे
वह शास्त्र हिंदी व्याकरण कहलाता ||

Wednesday, 31 May 2017

'सागर की गहराई' कविता

*सागर ने जाकर अंत में अपने

एक क्षितिज बनाया

जहाँ पर उसने रोज़ की भाँति

धरती,आकाश  मिलाया

*तेज लहरों से उसने अपनी
बालू का ज़र्रा बनाया
फिर उसने उस बालू के जर्रे को
तट तक पहुँचाया

*हुआ हर पत्थर ज़र्रा-ज़र्रा
लहरों से टकराकर
मिल गया फिर वह तट की
उस दरदरी रेत में जाकर

*सागर ने अपनी गहराई में
कितने ही राज छुपाए 
सीप के हर मोती ने
कई राज़ हमें बतलाए 

*छुपा खजाना इसके अंदर
कोई जो भेद ना पाया
इसकी गहराई के तल को
कोई भी समझ ना पाया ||

***जीवन का सच **कुछ मीठे कुछ खट्टे अनुभव विधा- लेख

विधा- लेख

जीवन अगर खट्टा-मीठा ना हो तो जीवन जीने का मजा ही नहीं | फीका और बेस्वाद जीवन नीरस हो जाता है | खट्टे मीठे अनुभव ही जीवन को दिशा प्रदान करते हैं और मनुष्य को सन्मार्ग की ओर ले जाते हैं | जो इनसे हार मान लेते हैं वह अंधेरे में डूब जातें हैं और जो इसको जीत लेते हैं वह मंजिल को पा लेते हैं |
***
हार मानने से मनुष्य न्यूनता में चला जाता है | सभी के जीवन में ऐसे क्षण अवश्य आते हैं जब कुछ लोग उनके मार्ग में बाधक और कुछ साधक बनते हैं कुछ उनकी बढ़ाई और कुछ बुराई करते हैं और अन्य दूसरों के कहे में आकर अपना मत नहीं रखते उनके पीछे हो लेते हैं | एक व्यक्ति के लिए अपनी राय बनाना अच्छी बात है मगर उसे कमजोर बनाना दूसरी बात है अगर आप किसी के काम नहीं आ सकते तो उसकी सफलता में बाधक भी ना बने|
***
कहते हैं- मनुष्य का व्यक्तित्व‚ चरित्र मुख की आभा और कांति उसका संपूर्ण परिचय होती है | व्यक्ति को स्वयं परिचय देने की आवश्यकता ही नहीं होती अगर वह अपने यह तीनों गुण दूसरों के समक्ष प्रदर्शित कर देता है | अच्छा व्यक्तित्व कांतिसहित होता है और बुरा व्यक्तित्व कांतिहीन होता है |
***
किसी की उन्नति और विकास के आड़े आने से या किसी को नीचा दिखाने से कभी भी कोई महान नहीं बन सकता आप चाहे जितने भी ऊँचे पद पर क्यों ना हो आपका कृत्य आपको उस व्यक्ति की आँखों में नीचा ला देता है जिसके लिए आप सकारात्मक विचार नहीं रखते | सिर्फ अपने घेरे में आए व्यक्तियों का भला चाहना ही महान या बड़ा नहीं बनाता | बड़ा बनाता है आपका सभी के प्रति समान दृष्टिकोण |
***
जीवन में कुछ ऐसे ही खट्टे-मीठे अनुभव प्राप्त होते हैं जिन्हें भुलाना चाहते हुए भी आप भूल नहीं पाते और कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें बार-बार याद करने से सुख का अनुभव होता है | कुछ व्यक्ति आपकी उपाधियों और ज्ञान से परिचित होते हुए भी आपकी आलोचना करते हैं और कुछ आपका अनुसरण करते हैं |
***
कुछ व्यक्तियों के लिए आप का ज्ञान कोरे कागज के समान हो सकता है | कुछ आपके ऊपर गर्व करते होंगे और कुछ आपके जैसा बनना चाहते होंगे |कुछ अपने पद को लेकर बस इसी दंभ में जीते होंगे कि उनसे बेहतर कोई नहीं और उनसे आगे कोई नहीं निकल सकता और न ही वह किसी को बिना उनकी मंशा के आगे बढ़ने देंगे |
***
ऐसे लोग प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में आते हैं |ऐसे लोग जीवन में उस नुकीले रोड़े के समान होते हैं जिससे रू-ब-रू होने पर व्यक्ति अपनी आत्मा तक से घायल हो जाता है और जब इंसान आत्मा से घायल होता है तब वह टूटने लगता है मगर,अगर उस समय उसे कोई सहारा देता है उसके दुख से उसे उबारता है वह ईश्वर का स्थान पाता है | उसके बाद उस ईश्वर की कृपा आप पर हमेशा बनी रहती है और आपकी राह में काँटें बिछाने वाला व्यक्ति दूर खड़े देखता रहता है मगर कुछ कर नहीं पाता |
***
इसलिए हमेशा ईश्वर पर विश्वास रखो |ईश्वर सब देखता है और देर-सवेर इंसाफ जरूर करता है | चाहे इस लोक में चाहे उस लोक में करनी का फल हमेशा मिलता है इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करो ,दूसरों का भला चाहो दूसरों के मार्ग में कभी भी बाधक मत बनो हमेशा साधक का फर्ज़ अदा करो | किसी को अपशब्द मत कहो ,मीठी वाणी बोलो और सरस व्यवहार रखो दूसरों की तरक्की से ईर्ष्या और द्वेष मत करो | कर्म करो फल की इच्छा मत करो |||||

बोए हैं जिसने काँटे
काँटें उसने पाए हैं
भला उसी का हुआ है
फूल जिसने बरसाए है
अच्छी वाणी और वचन
बोले और अपनाए हैं
नजरों में उसने सबकी
मान-सम्मान ही पाए हैं ||||