🔴 एक सवाल, जो हम सबको खुद से पूछना चाहिए...
पहले लोग कहते थे—"इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।"
आज लगता है—इंसान की जान सबसे सस्ती चीज़ हो गई है।
सुबह अख़बार खोलिए, रात का समाचार देखिए—कहीं पत्नी ने पति की हत्या कर दी, कहीं पति ने पत्नी की जान ले ली। कहीं बेटे ने बूढ़े माँ-बाप को मार डाला, कहीं माता-पिता ने अपने ही बच्चों का जीवन छीन लिया। छोटी-सी कहासुनी, थोड़ी-सी नाराज़गी, कुछ रुपये, थोड़ा-सा शक... और फैसला सीधे मौत!
सोचिए, हम किस समाज की ओर बढ़ रहे हैं?
जिस घर में बच्चों को प्रेम, धैर्य और संवाद सीखना था, वहाँ वे हिंसा देख रहे हैं। जिस समाज में कानून का डर होना चाहिए था, वहाँ अपराधी बेखौफ दिखाई देते हैं। जिस व्यवस्था का काम नागरिकों को सुरक्षा देना है, उसे केवल घटनाओं के बाद जागना नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पहले से सक्रिय होना होगा।
जब हत्या एक खबर बनकर रह जाए और संवेदना कुछ घंटों में खत्म हो जाए, तब समझ लीजिए कि खतरा केवल किसी एक परिवार पर नहीं, पूरे समाज पर है।
आज ज़रूरत केवल कठोर कानून की नहीं, बल्कि परिवारों में संवाद, समाज में संवेदना और प्रशासन की सतर्कता की भी है। हर हत्या केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, वह समाज के चरित्र पर लगा एक गहरा घाव होती है।
आइए, ऐसी व्यवस्था और ऐसा समाज बनाने की मांग करें जहाँ किसी की जान लेना आसान नहीं, बल्कि कानून का भय और इंसानियत का सम्मान सबसे बड़ा हो।
क्या हम आने वाली पीढ़ी को प्रेम का समाज देंगे या हिंसा की विरासत?
No comments:
Post a Comment