शिकायतों का राष्ट्रीय महोत्सव
आजकल देश में अगर कोई चीज़ सबसे ज़्यादा मुफ्त में मिलती है,
तो वह है — शिकायत!
सुबह आँख खुलते ही शिकायत शुरू…
“नींद पूरी नहीं हुई…”
चाय मिली तो शिकायत — “चीनी कम है…”
ऑफिस गए तो शिकायत — “काम बहुत है…”
घर लौटे तो शिकायत — “आराम नहीं मिलता…”
अद्भुत बात यह है कि
जिसके पास साइकिल है, वह बाइक चाहता है…
जिसके पास बाइक है, वह कार चाहता है…
और जिसके पास कार है,
वह ट्रैफिक देखकर पैदल चलने की सोचता है।
आज का इंसान भी बड़ा विचित्र प्राणी है।
मोबाइल हाथ में लेकर कहता है —
“यार! जिंदगी में कोई साथ नहीं देता…”
और दूसरी तरफ़ पाँच सौ लोगों का स्टेटस देख रहा होता है।
कुछ लोग तो शिकायत करने में इतने अनुभवी हो चुके हैं
कि अगर जिंदगी अचानक अच्छी चलने लगे,
तो उन्हें बेचैनी होने लगती है।
फिर वे खुद ही कोई नई परेशानी ढूँढ लेते हैं
ताकि शिकायतों की परंपरा बनी रहे।
सोशल मीडिया ने तो इस कला को नया आयाम दे दिया है।
लोग पहले दुखी होते थे,
अब दुखी होकर फोटो भी डालते हैं।
कैप्शन होगा —
“कोई समझने वाला नहीं…”
और नीचे सौ कमेंट —
“Stay strong…”
सच कहूँ तो
अब संघर्ष कम और प्रदर्शन ज्यादा हो गया है।
हर कोई अपनी जिंदगी को
दूसरों की जिंदगी से तौल रहा है।
फिर शिकायत करता है कि
“सुकून नहीं है…”
अरे भाई!
सुकून ऑनलाइन नहीं मिलता,
वो तो अपने भीतर पैदा करना पड़ता है।
लेकिन नहीं…
हम तो शिकायतों के ऐसे कलाकार हैं
जो बारिश में भी रो देंगे कि
“धूप क्यों नहीं निकली…”
और धूप निकले तो कहेंगे —
“बहुत गर्मी है…”
लगता है अब सरकार को
“राष्ट्रीय शिकायत सम्मान” शुरू कर देना चाहिए।
जिस व्यक्ति ने दिनभर में सबसे ज्यादा शिकायतें की हों,
उसे गोल्ड मेडल मिलना चाहिए।
क्योंकि आजकल
कुछ लोगों की जिंदगी में संघर्ष कम हैं,
लेकिन शिकायतें विश्वस्तरीय हैं।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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