धूप, संघर्ष और मुस्कान
संघर्षों की धूप में रोज़ जलना पड़ता है,
तब कहीं जाकर इंसान को संभलना पड़ता है।
हर मोड़ पर मिलती हैं उलझनों की आंधियाँ,
फिर भी हौसलों का दीपक जलाना पड़ता है।
शिकायतें तो उम्रभर साथ चलती हैं मगर,
हर दर्द को चुपचाप सहना पड़ता है।
ज़िंदगी कभी आसान नहीं होती दोस्तों,
हर हाल में खुद को बदलना पड़ता है।
कभी अपनों से चोट मिलती है राहों में,
कभी गैरों के बीच भी अकेलापन लगता है।
मगर टूटकर बिखर जाना हल नहीं होता,
इसलिए मुस्कुराकर आगे बढ़ना पड़ता है।
क्योंकि जिंदगी वही जी पाता है सच्चे अर्थों में,
जो आँसुओं में भी उम्मीद सजाना जानता है।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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