कुछ अनकही सी...
कुछ अनकही सी बातें हैं,
जो शब्दों तक आकर लौट जाती हैं,
आँखों की दहलीज़ पर ठहरकर
चुप्पियों में कहीं खो जाती हैं।
कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं,
जो आँसुओं का सहारा नहीं लेते,
बस मुस्कानों की ओट में छिपकर
धीरे-धीरे उम्र भर चलते रहते।
कुछ रिश्ते किताबों जैसे होते हैं,
जिनके कई पन्ने कभी पढ़े ही नहीं जाते,
और कुछ लोग इतने अपने होकर भी
दिल की भाषा समझ नहीं पाते।
कुछ सपने रातों में नहीं,
जागती आँखों में पलते हैं,
मगर जिम्मेदारियों के मौसम में
अक्सर चुपचाप बिखर जाते हैं।
कुछ अनकही सी शिकायतें हैं,
कुछ अनसुने से सवाल,
जिनका उत्तर शायद वक्त के पास है,
या फिर किसी बीते हुए ख्याल के पास।
फिर भी जीवन चलता रहता है,
हर अधूरी कहानी के साथ,
क्योंकि हर अनकही बात का भी
एक मुकम्मल अर्थ होता है कहीं न कहीं।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन
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