साहित्य सिंधु **गद्य-पद्य संग्रह**
Wednesday, 16 May 2018
ग़ज़ल
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ग़ज़ल नीरू मोहन 'वागीश्वरी' अपनी ग़ुर्बत को यूँ दुनिया से छुपा रक्खा था ध्यान लोगों का कहीं और लगा रक्खा था छलनी होता था जिगर, अश...
हमारी सांसे
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हमने गुरबत में भी दम साँसो में छिपा रखा था । कतरे-कतरे पे स्याही का असर लगता था । यूँ तो देखी थी जमाने की रुसवाई हमने । खाली हाथों पे अं...
Sunday, 13 May 2018
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[5/13, 8:50 AM] +91 98262 78837: जननी का जो हुआ नही, वो जन्मभूमि का क्या होगा, ऐसे नींच कपूतों से, अब कर्मभूमि का क्या होगा, माँ को छो...
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